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11 आदिवासियों के साथ बला’ त्कार के 15 साल बाद, आंध्र पुलिस के 13 आरोपी बरी

Posted on April 7, 2023 - 11:55 am by

एससी और एसटी मामलों के विशेष न्यायाधीश ने 6 अप्रैल को अल्लुरी जिले के जी मदुगला मंडल के वाकापल्ली में 2007 में 11 आदिवासी महिलाओं के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के सभी 13 ग्रेहाउंड कर्मियों को बरी कर दिया.

आईपीसी की धारा 376(2)(जी) और एससीएसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था.

क्या है पूरा मामला

मामला आध्रप्रदेश के अल्लुरी जिले के जी मदुगला मंडल के वाकापल्ली में वर्ष 2007 में 11 आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था. बलात्कार का आरोप पुलिसकर्मियों पर लगा था.

यह मामला 20 अगस्त 2007 की है, जब नकस्ल विरोधी अभियान के तहत पुलिसकर्मी वाकापल्ली गांव के जंगलों में तलाशी कर रहे थे, उसी के दौरान 13 आदिवासी महिलाओं के साथ कथित सामूहिक बलात्कार हुआ था, जिससे देशभर में आक्रोश फैल गया था.

हालांकि, 2007 में बलात्कार की सूचना मिली थी, लेकिन 2018 तक मुकदमा शुरू नहीं हुआ था. आरोपियों ने हमेशा दावा किया था कि महिलाओं ने झूठी शिकायत दर्ज कराई थी. सुनवाई शुरू करने के लिए महिलाओं को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय और बाद में उच्चतम न्यायालय(Supreme Court) का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

बता दें कि आंध्र प्रदेश में पुलिसकर्मियों के खिलाफ सबसे लंबी सुनवाई के दौरान 11 महिलाओं में से दो की मौत हो गई. विशेष अदालत ने कहा कि पुलिस ने न्यायाधीश द्वारा मांगे गए दस्तावेज भी पेश नहीं किए.

पुलिसकर्मियों को बरी करते हुए, विशाखापत्तनम में एक विशेष एससी/एसटी अदालत ने जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की और आदेश दिया कि उन महिलाओं को मुआवजा दिया जाए.

बलात्कार का आरोप लगाने वाली महिलाएं आदिम जनजाति कोंध समुदाय से संबंधित है. जिसे सरकार ने विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह” के रूप में मान्यता प्राप्त है.

जांच अधिकारियों पर कार्यवाई के लिए शीर्ष समिति के पास भेजने का निर्देश

न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि रिटायर्ड निरीक्षक एम शिवानंद रेड्डी  को कार्रवाई करने के लिए राज्य की शीर्ष समिति के पास भेजा जाए. एम शिवानंद रेड्डी मामले के जांच अधिकारियों में से एक थे, राज्य ने बलात्कार के मामलों में जांच अधिकारियों की विफलता की निगरानी के लिए गृह सचिव की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था.

अदालत ने यह भी कहा कि एक अन्य जांच अधिकारी, बी आनंद राव, त्वरित और उचित जांच करने में विफल रहे, लेकिन उन्होंने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उनका निधन हो चुका है.

मामले पर क्या हुआ

आरोपियों ने अपराध में अपनी संलिप्तता से इनकार किया था, उन्होंने आरोप लगाया था कि महिलाओं ने माओवादियों के प्रभाव में झूठी शिकायत दर्ज कराई थी. महिलाओं ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि एपीएसपी के 21 कर्मियों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया, लेकिन उनमें से आठ को पहले दोषी नहीं पाया गया.

इन विषय को मानवाधिकार समूहों द्वारा कारण उठाए जाने के बाद पडेरू पुलिस ने मामला दर्ज किया. विशाखापत्तनम जिला पुलिस ने शुरू में मजिस्ट्रेट के सामने एक रिपोर्ट दायर की, जिसमें कहा गया था कि महिलाओं पर कोई चोट नहीं थी और वे उन पुरुषों की पहचान करने में असमर्थ थीं, जिन्होंने उनके साथ कथित रूप से बलात्कार किया था.

पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि आरोप बिना सबूत के था और मामला बंद किया जाना चाहिए. इसके बाद महिलाओं ने पडेरू मजिस्ट्रेट के सामने एक विरोध याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि बलात्कार बंदूक की नोंक पर किया गया था. निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच के लिए एपी गिरिजन सांख्य द्वारा दायर एक याचिका पर, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने सीआईडी जांच का आदेश दिया. इसके बाद आरोपी पुलिसकर्मियों ने आगे की कार्रवाई पर स्टे ले लिया. 2009 में उनके निधन से पहले इस मामले को शुरू में प्रमुख मानवाधिकार अधिवक्ता के बालगोपाल ने उठाया था.

अप्रैल 2012 में उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि 13 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा शुरू होना चाहिए और आठ अन्य पुलिसकर्मियों की याचिका खारिज करने की अनुमति दी.

अगस्त 2012 में आरोपी ने मामले को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सितंबर 2017 में, शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि वाकापल्ली मामले में सुनवाई तेज की जाए और छह महीने के भीतर पूरी की जाए, जिसके बाद विशेष अदालत ने इस पर सुनवाई की.

चूंकि जांच में विफलता के कारण अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था, अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को महिलाओं को मुआवजे की मात्रा तय करने के लिए कहा.

महिला अधिकारों के लिए खड़े होने वाले मानवाधिकार फोरम के वाई राजेश ने कहा, “फैसला वाकापल्ली की महिलाओं के लिए एक बड़ी जीत है. वे न्याय की अपनी मांग पर अडिग रहीं. अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने अपना संघर्ष कभी नहीं छोड़ा.”

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