Skip to main content

महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्र में क्यों हुई 411 मौतें?

Posted on September 29, 2022 - 12:27 pm by

जनहित याचिका/133/2007  डॉ राजेंद्र सदानंद बर्मा और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य मामले में चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एम. एस. कार्णिक ने महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण के कारण कई बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मृत्यु से संबंधित 2007 में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने हाल ही में कहा था कि आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण से आदिवासी महिलाओं और बच्चों की मौत हो रही है।

उचित सड़क और मेडिकल सुविधा का न होने से समस्या बढ़ी है

जनवरी 2022 से जिलें में 411 लोगों की मौत को लेकर आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता और मामले में हस्तक्षेप करने वाले बंटू साने ने अदालत को व्यक्तिगत रूप से सूचित किया था। इन मौतों में 86 बच्चों की मौत कुपोषण और मेडिकल सुविधाओं के कारण हुई है। साने ने अदालत को यह भी बताया कि क्षेत्र में उचित सड़के और मेडिकल सुविधा का न होना इस समस्या को अधिक बढ़ाती है।

रिपोर्ट के अनुसार मौतों के कारण बनने परिस्थिति को रोका जा सकता है या आसानी से इलाज किया जा सकता है। स्वास्थ्य कार्यक्रमों के ठीक से लागु नही होने के कारण बच्चों की मृत्यु हुई है।

विशेष डॉक्टरों और मेडिकल अटेंडेंट की कमी से आदिवासी महिलाएं और बच्चें प्रभावित

चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एम.एस. कार्णिक की खंडपीठ ने महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्र में उचित मेडिकल देखभाल के अभाव में महिलाओं और बच्चों की मौत के संबंध में जनहित याचिका में इस पर ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ डॉक्टरों और मेडिकल अटेंडेंट की सहायता के लिए उनकी कमी आदिवासी महिलाओं और बच्चों को प्रभावित करने का एक प्रमुख कारण है। साथ ही कोर्ट को हाल ही में सूचित किया गया था कि महाराष्ट्र मेडिकल एंड हेल्थ सर्विसेज में ग्रुप ए के 62 फीसदी पद एमबीबीएस और बीएएमएस डॉक्टरों के पद खाली हैं. 1786 पदों में से 1112 रिक्त हैं।

कोर्ट ने कहा कि पर्याप्त संख्या में बाल रोग विशेषज्ञों, पोषण विशेषज्ञ और स्त्री रोग विशेषज्ञों की मौजूदगी जनजातीय क्षेत्रों में समय पर मेडिकल सहायता हासिल करने में काफी मददगार साबित हो सकती है। कोर्ट ने मेलघाट क्षेत्र के बच्चों में कुपोषण से होने वाली मौतों और राज्य को रिक्तियों को भरने के लिए उठाए जा रहे कदमों और स्थिति के पीछे के कारणों के बारे में सूचित करने के लिए कहा।

जिला कलेक्टर ने हलफनामा दायर किया

पूर्व के निर्देशों के अनुसार, नंदुरबार जिला कलेक्टर मनीषा खत्री सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष उपस्थित थीं और उन्होंने इस साल जनवरी से ज़िले में मौतों को रोकने के लिए किए गए उपायों पर एक हलफनामा दायर किया। नंदुरबार ज़िला कलेक्टर ने बताया कि ज़िले में तीन नाव एम्बुलेंस और एक तैरती नाव डिस्पेंसरी है. इसके अलावा, जिले के गांवों को जोड़ने वाले दो पुलों के निर्माण में मेडिकल कर्मचारियों की यात्रा की सुविधा के लिए ठेकेदार की विफलता और कोविड महामारी के कारण देरी हुई, लेकिन हलफनामे के अनुसार दिसंबर, 2023 तक पूरा हो जाएगा।

ग्रुप सी के 9351 पद खाली हैं

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट जे टी गिल्डा ने बताया कि राज्य में स्वास्थ्य सेवा आयुक्तालय द्वारा डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों के लिए स्वीकृत अधिकांश पद खाली हैं. अदालत को बताया गया कि महाराष्ट्र जनरल स्टेट सर्विस ग्रुप बी (बीएएमएस डॉक्टर्स) के 74 फीसदी पद खाली हैं। वहीं ग्रुप सी (स्टाफ नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ आदि) और ग्रुप डी (चपरासी, चौकीदार आदि) के लिए स्वीकृत पदों के हाई नंबर को देखते हुए रिक्त पदों का असामान्य रूप से उच्च 30 फीसदी है। ग्रुप सी के लिए 22234 पद भरे गए हैं, जबकि 9351 पद खाली हैं। बंडू साने ने कहा कि 11 संवेदनशील क्षेत्र हैं, जहां मेडिकल सुविधाएं अपर्याप्त हैं और इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

कोर्ट ने अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को तय की है।

No Comments yet!

Your Email address will not be published.