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आदिवासी महिलाओं के पैतृक संपत्ति में हक के लिए 50 साल की लड़ाई

Posted on November 6, 2022 - 10:00 am by

हिमाचल प्रदेश के आदिवासी क्षेत्र किन्नौर की 70 वर्षीय रतन मंजरी नेगी महिलाओं के लिए आशा की किरण है. जो हजारों महिलाओं के लिए  पैतृक संपत्ति में समान अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं.  

किन्नौर के आदिवासी क्षेत्र का प्रथागत कानून (Customary law), ‘वाजिब-उल-अर्ज’, जिसे ‘रिवाज-ए-आम’ के नाम से भी जाना जाता है. जिसमें  पत्नी और बेटियों को उनके पति और पिता की पैतृक संपत्ति में किसी भी हिस्से से वंचित करता है.

ब्रिटिश भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त सैन्य दिग्गज कर्नल पी एन नेगी की बेटी है मंजरी नेगी. इस पुरातन प्रथा से छुटकारा पाने और संपत्ति में महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए लगभग पांच दशकों से लंबी लड़ाई लड़ रही हैं.

मंजरी का कहना है कि अगर केंद्र तीन तलाक को खत्म कर सकता है,  तो महिलाओं की नरक जैसी स्थिति बनाने वाली प्रथा को क्यों नहीं खत्म किया जा सकता?  मैं एक सैनिक की बेटी हूं और इस लड़ाई को इसके तार्किक अंत तक ले जाना चाहती हूं. क्योंकि यह महिलाओं के स्वाभिमान का मामला है.

रिकॉन्ग पियो से लगभग 25 किमी दूर स्थित रिब्बा गांव में उनका घर है. मंजरी रिब्बा में अपने चार बीघा सेब के बाग में बने एक सुव्यवस्थित लकड़ी के कुटीर में अकेली रहती है. टाईम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्ट में मंजरी कहती है कि उन्होंने इस मुद्दे को उजागर करते हुए सभी प्रधानमंत्रियों को लिखा है.  उनके पत्रों को उनके सभी कार्यालयों द्वारा स्वीकार किया गया है.  लेकिन अब तक कुछ भी नहीं किया गया है. उन्होंने इस मुद्दे पर उनके साथ चर्चा करने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा व्यक्त की.

अपने संघर्ष को याद करते हुए बताती है कि उसका संघर्ष तब शुरू हुआ जब वह 22 वर्ष की थी और ग्राम प्रधान चुनी गई थी. “मैं एक सेना अधिकारी की बेटी थी और इस तरह के एक रिवाज से अवगत नहीं था. जब मैं प्रधान बन गया,  तो कई महिलाएं मेरे पास आती थीं.  अपनी समस्याओं को लेकर जिसमें वे संपत्ति के अधिकार से वंचित थे. उस समय  मुझे एहसास हुआ कि जब लड़का या लड़की एक ही कोख से पैदा होते हैं.  तो समाज बालिकाओं के साथ भेदभाव कैसे कर सकता है.

वह एक गैर सरकारी संगठन, ‘महिला कल्याण परिषद’ चलाती हैं. महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के लिए काम कर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसे HC का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा गया था. उसके बाद उसने इस मुद्दे पर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका भी दायर की थी.

“मेरी याचिका लंबे समय से लंबित है और कोविड -19 महामारी के कारण लगभग दो साल तक सुनवाई के लिए नहीं आ सकी. मैंने केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार से भी जवाब मांगी है.  लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों सरकारें इस पर टालमटोल कर रही हैं. उन्होंने इस मुद्दे पर अपना जवाब दाखिल किया. हमारे पास एक हस्ताक्षर अभियान था, जिसमें आदिवासी क्षेत्र की लगभग 10,000 महिलाओं ने आंदोलन का समर्थन करने के लिए हस्ताक्षर किए थे.”

मंजरी के अनुसार  वे विधानसभा चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों से इस मुद्दे का समर्थन करने का अनुरोध कर रहे हैं.  लेकिन किसी ने भी उनके लिए प्रतिबद्धता नहीं जताई है.

कानून बदलने की उनकी चाहत ने उन्हें 1980 के दशक में किन्नौर विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया. वह किन्नौर से विधानसभा चुनाव लड़ने वाली पहली महिला थीं लेकिन वह हार गईं. मंजरी के अनुसार  उन्हें देश के अन्य आदिवासी हिस्सों से फोन आ रहे हैं जहां महिलाएं भी इसी तरह का बदलाव चाहती हैं.

मंजरी ने ग्रेजुएट किया हैं तथा विवाह न करने का फैसला किया था. उसके तीन भाई और तीन बहनें हैं.

ग्राफिक: विक्की कुमार

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