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आरक्षण 32 फीसदी जारी रखने के लिए आदिवासी समुदाय कर रही है आंदोलन

Posted on October 8, 2022 - 12:30 pm by

हाईकोर्ट ने 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को रद्द किया है। प्रदेश में अब तक कुल 58 प्रतिशत आरक्षण लागू था इसमें एसटी 32, एससी 12 और ओबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण था। हाईकोर्ट के आदेश का बड़ा असर हुआ है। एसटी वर्ग का आरक्षण 32 से घटकर 20 प्रतिशत रह गया है। भाजपा इसे कांग्रेस सरकार की नाकामी बता रही है। इसे लेकर शनिवार को भाजपाइयों ने कोंडागांव-नारायणपुर मार्ग में 3 घंटे एनएच पर जाम लगा दिया।

भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष विकास मरकाम ने कहा कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के आरक्षण सहित अन्य संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए चक्काजाम किया जा रहा है वहीं सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ ने 10 अक्टूबर को राज्य बंदी बुलाया है।

क्या है मामला

गुरू घासीदास साहित्य और संस्कृति अकादमी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य और अन्य जुड़े मामले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सोमवार 19 सितंबर को आरक्षण पर बड़ा फैसला लेते हुए राज्य में भर्ती और प्रवेश परिक्षाओं में एससी, एसटी और ओबीसी को 58 फीसदी आरक्षण प्रदान करने वाले 2011 के संशोधन को रद्द कर दिया ।

लाइव लॉ के अनुसार चीफ जस्टिस ए.के. गोस्वामी और जस्टिस पीपी साहू ने आरक्षण नीति को रद्द कर दिया और कहा कि “हमारी राय है कि आरक्षण को बढ़ाकर 58 फीसदी करने के लिए 50 फीसदी की आरक्षण सीमा का उल्लघंन करने के लिए कोई विशेष मामला नही बनता है। राज्य के तहत सेवाओं में प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता या शैक्षणिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता हद तक प्रासंगिक है। आरक्षण को 50 फीसदी से कम करने की मांग की गई है, लेकिन अगर उच्चतम सीमा को पार करना है तो प्रतिनिधित्व में अपर्याप्तता एकमात्र निर्धारण कारक नहीं हो सकता है और असाधारण परिस्थिति होनी चाहिए”
इसकी वजह से अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 32 से घटकर 20 फीसदी पर आ गया है। वहीं अनुसूचित जाति का आरक्षण 13 से बढ़कर 16 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 14 फीसद हो गया है।

याचिका की पृष्ठभूमि क्या है

छत्तीसगढ़ लोक सेवा(SC, ST, OBC आरक्षण) अधिनियम, 1994 पर 2011 में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली रिट याचिका से छत्तीसगढ़ कोर्ट निपट रहा है। 2011 में छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा संशोधन के माध्यम से सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षित वर्गों के लिए 58 फीसदी कोटा (SC-12%, ST-32% और OBC- 14%) आरक्षित किया गया। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि 1994 के अधिनियम की धारा 4 (2) में संशोधन के प्रभाव से आरक्षण 58% हो गया। इस प्रकार यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंद्रा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य, और एम.आर. बालाजी और अन्य बनाम मैसूर राज्य और अन्य में निर्धारित आरक्षण सिद्धांत के लिए असंवैधानिक है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट विनय कुमार पांडे ने तर्क दिया कि यह भी भारत के संविधान के ए 16 (1) के तहत अवसर की समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है। यह भी दलील दी गई कि सभी पदों पर अनुसूचित जाति के संबंध में प्रतिशत को 16% से 12% तक कम करना उचित नहीं है, क्योंकि वे सेवा में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। इसी प्रकार, अनुसूचित जनजातियों के संबंध में प्रतिशत में 20 से 32% की वृद्धि को भी बिना किसी तर्क के आधार बताया गया।

छत्तीसगढ़ भाजपा और कांग्रेस ने एक दूसरे पर लगाया आरोप

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उच्च न्यायालय के निर्णय को कांग्रेस सरकार की बड़ी विफलता बताया है। उन्होने कहा कि इस सरकार ने विषय को गंभीरता से नही लिया। हमारी सरकार आरक्षण के मुद्दे पर काफी गंभीर थी और हमने फैसला भी लिया था। सरकार सही तरीके से पक्ष नही रख पायी जिससे आरक्षण कम हो गया।
वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि 2012 में विलासपुर उच्च न्यायालय में 58 फीसदी आरक्षण के खिलाफ याचिका दायर हुई। तब रमन सिंह सरकार ने सही ढंग से वह कारण नही बताई जिसकी वजह से राज्य में आरक्षण को 50 से बढ़ाकर 58 फीसदी किया गया।

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