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आंध्रप्रदेश: आदिवासियों ने बच्चों की पढ़ाई के लिए सड़क साफ की

Posted on January 12, 2023 - 10:55 am by

आंध्र प्रदेश में अल्लुरी सीता रामा राजू जिले के रिमोट एरिया के एक छोटे से गांव  नीरेदु बांदा के बच्चों के लिए स्कूल जाना एक कठिन रास्ता था. स्कूल जाने के लिए बच्चे पांच किलोमीटर तक कांटों और झाड़ियों से गुजरकर जाना पड़ता था. ऐसे में बच्चों के लिए अपने स्कूल तक पहुँचने के लिए रास्ते पर चलना इतना कठिन हो गया कि गाँव के बड़े-बूढ़ों ने उन्हें घोड़े पर बिठाकर वापस स्कूल ले जाना शुरू कर दिया. जब वहां के जनप्रतिनिधियों ने नहीं सुनी तो  ग्रामीणों ने केवल तीन दिनों में खुद सड़क बनाने के लिए 4 किमी के रास्ते को खुद ही साफ कर दिया.

आंध्र प्रदेश के अल्लुरी सीता रामा राजू जिले में चीमलपडु पंचायत से लगभग 16 किमी और रविकमटम मंडल से 25 किमी दूर है. यह गांव एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है. गाँव में लगभग 12 परिवार हैं जो कोंडू जनजाति के हैं, जिन्हें आदिम जनजातीय समूह (PTG) या विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

अधिकारियों ने नहीं सुनी बात, तो खुद ही सड़क बनाने का फैसला किया

गांव में एकमात्र सड़क है जो कि पहाड़ी तक जाती है. सड़क नहीं होने से आदिवासी गांव के लोग परेशान हैं. वहां के 15 में से लगभग 12 बच्चे जेड जोगमपेटा में एमपी (मंडला परिषद) प्राथमिक स्कूल में पढ़ते हैं जो गांव से लगभग 5 किमी दूर स्थित है. दोनों गांवों को जोड़ने वाला रास्ता झाड़ियों और कांटों से भरा हुआ था. ग्रामीणों ने मंडल परिषद विकास अधिकारी (एमडीपीओ) से बार-बार सड़क बनवाने की गुहार लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. अंत में उन्होंने खुद ही काम अपने हाथ में लिया और रास्ता साफ करना शुरू कर दिया. उन्होंने यह काम महज तीन दिन में पूरा कर लिया.

स्थानीय अखबार द न्यूज मिनट रिपोर्ट के अनुसार गिरिजन संगम पांचवी अनुसूचू साधना समिति के जिला अध्यक्ष गोविंद राव कहते हैं कि वहां पर एक सड़क थी. जिसका निर्माण ब्रिटिश कब्जे के दौरान हुई थी. उस सड़क का उपयोग बांस को कागज निर्माण उद्योगों तक पहुंचाने के लिए किया जाता था. सड़क समय के साथ खराब हो गई है और मुश्किल से ही कोई गाड़ी आ जा सकती है. आदिवासियों ने अपने दम पर इसकी मरम्मत की क्योंकि एकीकृत जनजातीय विकास एजेंसियों (आईटीडीए) के अधिकारी पक्की सड़कों के निर्माण के लिए कोई ध्यान नहीं दे रहे थे.

गांव पहले भी थी चर्चा में

उन्होने आगे बताया कि नीरेदु बांदा से अधिक ऊंचाई पर एक और गांव है, उस गांव में कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता है. आदिवासी छात्रों के लिए सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालयों में नामांकित होने से पहले इस गाँव और आस-पास के गाँवों के बच्चे जेड जोगमपेटा के प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 5 तक पढ़ते हैं. नीरेदु बांदा गांव अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए जाना जाता है. पहले भी यह गांव खबरों में था, जब गांव के लोग अपने बच्चों को बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए खुद को शिक्षित कर रहे हैं. इससे पहले 2021 में आदिवासियों ने अपने बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए आधार कार्ड प्रदान करने के लिए जिला कलेक्टर से संपर्क किया और सफल हुए.

गांव में भी एक स्कूल बने

गांव के आदिवासी डिप्पल्ला अप्पलराव कहते हैं कि बच्चे स्कूल जाने के लिए बहुत छोटे हैं. पहाड़ी की चोटी से 5 किमी की दूरी पर खुद यात्रा करते हैं. इस रास्ते से बुजुर्ग लोगों का सफर करना भी मुश्किल होता है. इसलिए हमारे पास जो भी पैसा था, उससे हमने घोड़े ख़रीदे. हमें सुबह उनके साथ जाना है, वहीं रहना है और शाम को उन्हें वापस लाना है. क्या हमें अपने बच्चों को स्कूल ले जाना चाहिए या अपनी रोटी कमाने के लिए काम करना चाहिए?” उन्होने सरकार से मांग की है कि उसके गांव में भी एक स्कूल बने.

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