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आदिवासियों पर एक और हमला, एमपी से उठी ST/SC  हटाने की मांग, जानिए पूरा मामला

Posted on January 9, 2023 - 3:19 pm by

विजय उरांव, ट्राइबल खबर संवाददाता

ट्वीटर में #ScSt_एक्ट_हटाओ लगातार ट्रेंड कर रहा है. जिसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट में गिरफ्तारी रोकने की मांग ट्रेंड कर रहा है. दरअसल भोपाल के जंबूरी मैदान में करणी सेना के द्वारा 22 सूत्री मांगों को लेकर 8 जनवरी को प्रदर्शन किया गया. करनी सेना ने मांग नहीं मानने पर मध्यप्रदेश विधानसभा घेराव करने की चेतावनी भी दी है.

क्या है एससीएसटी एक्ट

सामाजिक एवं आर्थिक रूप से अनुसूचित जाति तथा जनजाति पर हो रही प्रताड़ना को रोकने के प्रयास के लिए वर्ष 1989 में संसद के द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया गया था. इसे एसटीएससी एक्ट के नाम से भी जाना जाता है.

एससीएसटी एक्ट के मामले में क्या है आदिवासियों कि स्थिति

एनसीआरबी के आंकड़ो के अनुसार आदिवासियों पर किए गए अत्याचार 2015-19 तक दर्ज मामलों की संख्या 34,754 हैं, जिसमें 27,623 चार्जशीट मामले हैं, इन मामलों में 3,274 दोषी पाए गए, इसमें पीड़ितो की संख्या 36,843 हैं, गिरफतार किए गए व्यक्तियों की संख्या 49,786, चार्जशीट किए गए व्यक्तियों की संख्या 50,246 हैं तथा 4,852 लोगों को दोषी ठहराया गया.

वहीं 2015-19 तक 5085 रेप के मामले सामने आये है, वहीं 88 बार रेप करने की कोशिश की गई. 757 आदिवासियों की हत्या की गई. 4489 बार शील भंग करने के इरादे महिला आदिवासियों पर हमला किया गया. वहीं नवीनतम आकड़ों 2020 और 2021 की बात करे तो क्रमश: 172 और 206 हत्याएं है और 1148 बालात्कार (जिसमें 681 महिलाएं तथा 457 बच्चियां) तथा 1327 बालात्कार (812 महिलाएं तथा 515 बच्चियां) शामिल हैं.

सरकार अगर एसटीएसी एक्ट हटाती है तो आदिवासियों का क्या होगा?

आदिवासियों के विरुद्ध अपराध लगातार बढ़ते रहे हैं, NCRB के आकड़ों के अनुसार 2018 – 2020 में आदिवासियों के खिलाफ 26 फीसदी हिंसा बढ़ी है. वर्ष 2018 में 6,528 से बढ़कर 2020 में 8,272 हो गया, जो 26.71 प्रतिशत की वृद्धि है. वर्तमान में यह हिंसा और भी अधिक हो सकती है. कई मामले हैं जो थाने तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. विडंबना यह भी है कि न्यायालय सर्वोच्च पदों पर आदिवासियों कि संख्या नहीं है या न के बराबर है.

मार्च 2018 में मानवाधिकार व लैंगिक समानता कार्यकर्ता इंदिरा जैसिंग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससीएसटी एक्ट पर जजों के फैसले पर कहा था कि “भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने दो जाति के न्यायधीशों ने SC और ST अधिनियम को SC/ST की सुरक्षा को हटाकर ब्राह्मणों की सुरक्षा में बदल दिया है, कोई आश्चर्य नहीं है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पास कोई SC या ST नयायधीश नहीं है.”

भारत में आदिवासियों के साथ सिस्टेमेटिक हिंसा नयी नहीं है, यह हिंसा वन बेदखली, विकास के नाम पर विस्थापन, नक्सलियों के नाम पर हत्या और बिना अपराध के भी उम्र भर जेल रहना भी कोई आश्चर्य नहीं लगता है. लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच के अनुसार 703 संघर्षों में 25 फीसदी सिर्फ आदिवासी क्षेत्रों में है. 1990 के दसक के बाद से राज्य और कॉर्पोरेट समूहों दोनों के द्वारा आदिवासी भूमि पर अतिक्रमण देखने को मिलता है. आदिवासियों के मामले में एनसीआरबी सिर्फ अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ हिंसा को शामिल करती है लेकिन ऐसी ‘विमुक्त जनजातियां’ भी है. जिन्हें एनसीआरबी के डाटा में शामिल नहीं किया जाता है. यहां तक कि खानाबदोश जनजातियों के खिलाफ हो रहे अत्याचार भी चिंता का विषय है. विमुक्त जनजातियां और अन्य जनजातियां जो अनुसूची में शामिल नहीं है. उनके साथ लगभग प्रत्येक दिन प्रताड़ना और बलात्कार का सामना करना पड़ता है. उन्हे विधायी संरक्षण नहीं मिलता है, जिससे वे और कमजोर हो जाते हैं. क्योंकि वे अनुसूचित नहीं है.

ब्रिटिश शासन में आदिवासियों के एक बड़े हिस्से के उपर क्रिमिनल ट्राइबस एक्ट लाया था, जिससे वे जन्म से ही अपराधी घोषित हो गए थे. उसका परिणाम आज तक आदिवासी वर्ग भोग रहा है.

दलित नेता डॉ. अंबेदकर ने भारत में आदिवासियों(आदिम जाति और डीनोटिफाइड जातियों) की दयनीय स्थिति के लिए मुख्य रूप से जाति व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया था. दिसंबर 1946 में आदिवासियों के जयपाल सिंह मुंडा ने खुद को गर्व से जंगली कहते हुए कहा था कि “मैं उन लाखों लोगों की ओर से बोलने के लिए खड़ा हुआ हूँ. जो सबसे महत्वपूर्ण लोग हैं, जो आज़ादी के अनजाने लड़ाके हैं, जो भारत के मूल निवासी हैं और जिनको बैकवर्ड ट्राइब्स, प्रिमिटिव ट्राइब्स, क्रिमिनल ट्राइब्स और जाने क्या-क्या कहा जाता है. पर मुझे अपने जंगली होने पर गर्व है क्योंकि यह वही संबोधन है, जिसके द्वारा हमलोग इस देश में जाने जाते हैं.

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