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सरना धर्म कोड से अर्जुन मुंडा ने पल्ला झाड़ा

Posted on January 24, 2023 - 3:41 pm by

विजय उरांव, ट्राइबल खबर के लिए

झारखंड में चल रहे सरना धर्म कोड पर 20 जनवरी को झारखंड के चाईबासा में केंद्रीय जनजाति कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने सरना धर्म कोड से पल्ला झाड़ते हुए कहा था कि यह मसला आदिवासियों के सामुहिक विचारों पर छोड़ देना चाहिए. क्योंकि एक राज्य से आदिवासियों की पहचान नहीं होती है. बल्कि पहचान पूरे देश के लिए होती है, जिसके कई मापदंड हैं. देशभर में सात सौ समूहों में आदिवासी समुदाय रहता है. इसे देखते हुए यह मामला आदिवासी समुदाय पर ही छोड़ देना चाहिए. आदिवासी मामलों में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने यह बात झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन के उस बयान को लेकर कहा था जिसमें हेमंत ने कहा था कि केंद्र सरना धर्म कोड पास नहीं कर रही है.

वहीं रांची(झारखंड) की मेयर आशा लकड़ा ने भी कहा था कि सरना केवल एक धर्मस्थल है और धर्म स्थल के नाम पर धर्म कोड नहीं होता है.

क्या है सरना धर्म कोड की मांग

भारत में आदिवासियों के द्वारा पिछले सात दसक से जनगणना के लिए अलग धर्म कॉलम की मांग की जा रही है. जिससे आदिवासियों को अपने पहचान के बजाए हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध आदि न लिखना पड़े.  

बता दें कि वर्ष 2021 में झारखंड के विधानसभा में सरना आदिवासी धर्म कोड को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया था तथा हार्वड युनिवर्सिटी के एक कॉफ्रेंस में 21 फरवरी 2021 को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा था कि “आदिवासी कभी हिंदू नहीं थे, न हैं, इसमें कोई कंफ्युजन नहीं है. हमारा सबकुछ अलग है, इसी वजह से हम आदिवासी में गिने जाते हैं. हम प्रकृति पूजक है.”

हार्वड व्याख्यान के दौरान हेमंत/TOI

राजस्थान विधानसभा में डूंगरपुर विधायक गणेश घोघरा ने आदिवासी 9 मार्च 2021 को आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग करते हुए कहा था कि हमारा आदिवासी धर्म अलग है, हमारी संस्कृति, परंपरा व रीति रिवाज अलग है, हम प्रकृति को पूजते हैं. हिंदू के नाम पर हमारा शोषण हो रहा है, हमारा आदिवासी धर्म कोड अलग से दर्शाया जाए।

वहीं 11 अगस्त 2021 को राजमहल सांसद विजय हांसदा ने लोकसभा में सभी आदिवासियों को मिलाकर एक युनिक धर्मकोड की बनाने की मांग की थी, जिसके जवाब में कहा गया था कि यह संभव नहीं है, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में आदिवासी अपने-अपने धर्मकोड की मांग कर रहें हैं.

आदिवासी सेंगेल अभियान की ओर से 30 सितंबर को कोलकाता में सरना धर्म कोड को लेकर पांच राज्यों से जनसभा की गई थी.

 राष्ट्रीय आदिवासी समाज सरना धर्म रक्षा अभियान एवं दिल्ली सरना समाज के नेतृत्व में सरना धर्म कोड को लेकर दस से अधिक राज्यों से 12 व 13 नवंबर को नई दिल्ली के जंतर-मंतर में धरना दिया गया था.

इसके अलावा देशभर में सरना नहीं बल्कि आदिवासी धर्म कोड की मांग की जा रही है, यह मांग अखिल भारतीय धर्म परिषद  के द्वारा किया जा रहा है. इसको लेकर देशभर में बात भी की जा रही है.

क्या है आदिवासी धर्मकोड का इतिहास

ब्रिटिश भारत के जनगणना में 1871 से 1940 तक आदिवासियों के लिए अलग धर्मकोड के रूप में लिखा जाता रहा है, जिसमें 1871 में Aborigines, 1881 व 1891 में Aboriginal, 1901, 1911 व 1921 में Animist, 1931 में Tribal Religion, 1941 में Tribes तथा 1951 में Schedule Tribe.

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के आयुक्त रहे डॉ वेरियर एलविन, श्री यु. एन. वेबर व लक्ष्मीदास की आलोचना करते हुए सांसद रहे स्व. कार्तिक उरांव कहा था कि जनजाति(आदिवासी) की कल्याण की भावना को ही त्याग दिया था. इसलिए जनजातियों की परिभाषा नही दी, इसलिए आदिवासियों के धर्म कोड की अनदेखी की गई. 

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