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छत्तीसगढ़: गढ़िया पहाड़ के आदिवासियों के पास मिली 12वीं शताब्दी की सूर्य प्रतिमा

Posted on January 6, 2023 - 5:21 pm by

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के गढ़िया पहाड़ गांव के आदिवासियों के पास सात घोड़ों पर सवार सूर्यदेव की 12वीं शताब्दी की प्रतिमा मिली है. ग्रामीण इसकी पूजा करते हैं.

महंत घासीदास संग्रहालय के प्रमुख एवं संस्कृति, पुरातत्व विभाग के उप संचालक डा. प्रतापचंद पारख ने बताया कि प्रतिमा 12वीं शताब्दी की है. यह इस बात को प्रमाणित कर रहा है कि उस समय कांकेर में सोमवंश के राजा भानुदेव का शासन था. भानु का अर्थ सूर्य होता है. संभवत: भानुदेव सूर्य के उपासक रहे होंगे. उन्होंने कहा कि गढ़िया पहाड़ पुरातत्व की दृष्टि से बहुत ही समृद्ध है. भविष्य में यहां और नई ऐतिहासिक वस्तुएं मिलने की संभावना है.

सात घोड़े, सारथी के साथ सूर्यदेव

रायपुर से 125 किलोमीटर की दूर गढ़िया पहाड़ गांव में आदिवासियों द्वारा एक प्राचीन प्रतिमा की पूजा करने की जानकारी मिलने पर पुरातत्व विभाग के अधिकारी नववर्ष के पहले दिन वहां पहुंचे थे. उन्होंने देखा कि चार फीट ऊंची इस प्रतिमा में सूर्यदेव, उनके सारथी और सात घोड़ों का प्रतिरूप दिखाई दे रहा है. प्रतिमा कुछ जगह से थोड़ी खंडित भी हो चुकी है.

हाथों में कमल, पैरों में पादुका

इस प्रतिमा को स्थानीय लोग विष्णु के रूप में पूजा कर रहे हैं. स्थानक मुद्रा में सूर्य प्रतिमा के दोनों हाथों में सनाल पद्म (कमल), पादपीठ के नीचे रथ में सात अश्व, सारथी अरुण और दोनों पार्श्व में उनके अनुचर दंडीन और पिंगल हैं. वे पैरों में बूट के आकार की पादुका पहने हैं.

सौर संप्रदाय में सूर्य आराधना का महत्व

पुरातत्व विभाग के उप संचालक डा. प्रतापचंद पारख के अनुसार ऐतिहासिक दस्तावेजों में ब्राह्मण धर्म की पांच शाखाओं शैव, वैष्णव, सौर, शाक्त और गाणपत्य में से सौर संप्रदाय में इष्ट देवता सूर्य की पूजा, आराधना का प्रचलन रहा. सूर्य की आराधना वैदिक काल में सविता, मित्र और आदित्य नामों से होती रही. सूर्यदेव की प्रतिमाएं दूसरी सदी से बननी प्रारंभ हुईं और गुप्तकाल तक पाई जाती रहीं.

6वीं-7वीं सदी से सूर्य पूजा के प्रमाण

पारख बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में भी प्राचीनकाल से देवी-देवताओं की उपासना के साथ-साथ सूर्य पूजा के प्रमाण मिलते हैं. सिरपुर, मल्हार, डीपाडीह, नारायणपुर, महेशपुर आदि ऐतिहासिक स्थलों से सूर्य की प्रतिमाएं और मंदिर के भग्नावशेष मिले हैं.

इन प्रतिमाओं से पता चलता है कि इस अंचल में सूर्य पूजा प्राचीनकाल से की जा रही है. छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक कालीन शैलाश्रयों में भी सूर्य की आकृति चित्रित मिलती है. इससे इस बात को बल मिलता है कि प्रकृति देवता के रूप में सूर्य की पूजा की जाती है. छत्तीसगढ़ में उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि पांडुवंशी राजाओं के समय लगभग 6वीं-7वीं सदी ईस्वी में यहां सूर्य की प्रतिमाएं बनने लगी थीं.

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