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छत्तीसगढ़: सुप्रीम कोर्ट से आदिवासियों को बड़ा झटका, आरक्षण पर कही यह बात

Posted on January 18, 2023 - 1:27 pm by

छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर मामला बिगड़ता नजर आ रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने 55 फीसदी आरक्षण को लेकर मांगे गए स्टे को खारीज कर दिया. वहीं, कोर्ट ने इस याचिका पर सभी पक्षों से जवाब प्रस्तुत करने का ​आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट आरक्षण मामले पर अगली सुनवाई 22 मार्च को करेगी.

सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के गुरु घासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी वाले फैसले को लेकर 11 स्पेशल लीव पिटीशन दायर हुई हैं. इसमें से एक याचिका राज्य सरकार की, तीन आदिवासी संगठनों की, तीन आदिवासी समाज के व्यक्तियों की और चार याचिकाएं सामान्य वर्ग के व्यक्तियों की गई है. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस भी जारी किया हुआ है.

आर्थिक कारण से पेश नहीं हुए आदिवासी पक्ष के वकील

सुनवाई में 16 जनवरी को आदिवासी पक्ष के दो व्यक्तियों योगेश ठाकुर और विद्या सिदार की ओर से कोई वकील पेश नहीं हो पाया. बताया जा रहा है, ऐसा आर्थिक दिक्कतों की वजह से हुआ है. वहीं अनुसूचित जनजाति शासकीय सेवक विकास संघ की ओर से पेश अधिवक्ता ने 58 फीसदी आरक्षण जारी रखने की अंतरिम राहत देने की राज्य सरकार की मांग का समर्थन किया. संक्षिप्त सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से साफ इन्कार कर दिया है. अदालत ने चार मार्च तक सभी पक्षकारों को नोटिस का जवाब पेश करने को कहा है. मामले की सुनवाई अब 22-23 मार्च को तय हुई है.

हाई कोर्ट का प्रशासनिक आदेश भी पेश हुआ

सामान्य वर्ग के दो व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता कौस्तुभ शुक्ला ने 16 जनवरी को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का एक प्रशासनिक आदेश पेश किया. इस आदेश के जरिये हाई कोर्ट की भर्तियों में 50 फीसदी आरक्षण का फॉर्मुला लागू किया गया है. यानी अनुसूचित जाति को 16 फीसदी, अनुसूचित जनजाति को 20 फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग को 14 फीसदी का आरक्षण. यह आरक्षण 2012 का वह अधिनियम लागू होने से पहले लागू था. जिसको हाई कोर्ट ने असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया था.

 इस मामले में आदिवासी संगठनों के रुख से समाज को बड़ा नुकसान हो सकता है. उच्चतम न्यायालय ने 58 फीसदी आरक्षण को जारी रखने की राहत देने से इन्कार कर दिया है. उधर उच्च न्यायालय ने एक प्रशासनिक आदेश से 50 फीसदी आरक्षण को अपने यहां लागू कर चुका है. मेडिकल कॉलेजों में भी इसी फॉर्मुले से प्रवेश लिया गया है.

ऐसे में संभव है कि इसी फॉर्मूले से आगे भी कॉलेजों में प्रवेश और नौकरियों में भर्ती हो. इससे आदिवासी समाज को केवल 20 फीसदी आरक्षण मिल पाएगा. इस स्थिति से बचने के लिए समाज को एकजुट होकर कानूनी लड़ाई लड़नी होगी. अगर आदिवासी पक्षकार सुप्रीम कोर्ट से आरक्षण शून्य की स्थिति घोषित करने का वाद करते तो आरक्षण को बचाने के लिए दूसरे आरक्षित वर्गों में भी हलचल होती. अभी यह केवल आदिवासी समाज की लड़ाई रह गई है और हाई कोर्ट में उनका यह पक्ष रखने वाला कोई नहीं है.

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