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छत्तीसगढ़: राज्य सरकार ने किस आधार पर विशेष सत्र बुलाने का किया फैसला?

Posted on November 9, 2022 - 3:50 pm by

छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया है. यह सत्र HC के आदेश के बाद उत्पन्न स्थिति के आधार पर चर्चा करने के लिए अगले महीने बुलाई है. जिसके कारण अनुसूचित जनजातियों (एसटी) कोटा में कमी हुई है.

एक और दो दिसंबर को बुलाई जाएगी विशेष सत्र

इस विशेष सत्र की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्वीट करके दी. उन्होंने कहा कि आदिवासी आरक्षण के विषय को लेकर विधानसभा का विशेष सत्र आहूत करने का प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत जी को भेजा है. आगामी एक एवं दो दिसंबर को विधानसभा का विशेष सत्र आहूत किए जाने का आग्रह किया है.

दरअसल सितंबर में HC के फैसले के बाद जो स्थिति पैदा हुई है.  उस पर विशेष सत्र के दौरान चर्चा होने की संभावना है. इसके परिणामस्वरूप राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी और प्रवेश में अनुसूचित जनजाति (एसटी) कोटा 32 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है. 

इससे पहले 21 अक्टूबर को तीन दिवसीय छत्तीसगढ़ आदिवासी महोत्सव का उद्घाटन करने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए बघेल ने इस बारे में स्पष्ट किया था. उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार राज्य में आदिवासियों के लिए उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण बढ़ाने के लिए जल्द ही सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगी.

क्या है पूरा मामला

उन्होंने कहा था कि जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का हिस्सा था.  तब राज्य में 20 फीसदी एसटी और 16 फीसदी एससी थे.  छत्तीसगढ़ के निर्माण के बाद राज्य में 32 प्रतिशत एसटी और 13 प्रतिशत एससी थे. इसके साथ उन्होंने आरोप लगाया कि 2005 में केंद्र ने छत्तीसगढ़ में जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण देने की मंजूरी दी थी. लेकिन पिछली राज्य सरकार ने 2005 से 2011 तक इसे रोक दिया था.

इसके बाद 2011-12 में, आदिवासियों के आंदोलन करने पर राज्य सरकार ने उन्हें 32 प्रतिशत, एससी को 12 प्रतिशत और ओबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया, जिससे कुल 58 प्रतिशत आरक्षण हुआ, यह मानते हुए कि कोई भी कोटा 50 प्रतिशत से ऊपर था. उन्होंने इसे ‘असंवैधानिक है’  कहा था.

बघेल ने कहा कि बाद में  दो समितियों का गठन किया गया था. लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश नहीं की और इसके कारण उच्च न्यायालय ने आरक्षण पर निर्णय को रद्द कर दिया. राज्य सरकार ने इस संबंध में एक आयोग का भी गठन किया है और वह नवंबर में अपनी रिपोर्ट देगी.

वरिष्ठ आदिवासी नेता और आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने पिछले महीने कांग्रेस की स्थिति को दोहराया था. जो यह था कि उच्च न्यायालय में झटका इसलिए लगा क्योंकि पिछली भाजपा सरकार ने आरक्षण को 58 प्रतिशत तक बढ़ाने के अपने फैसले का बचाव करने के लिए तथ्यों को ठीक से पेश नहीं किया था.

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