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आदिवासियों में बाल विवाह अब भी जारी, आंकड़े हैरान करने वाले

Posted on March 18, 2024 - 6:17 pm by
आदिवासियों में बाल विवाह अब भी जारी, आंकड़े हैरान करने वाले

बाल विवाह भारतीय समाज की वैसी कुप्रथा है जिसकी जड़ें आज भी समाज में अपनी पकड़ बनाये हुए है. खासकर पिछड़ों इलाकों में. हालांकि बढ़ती शिक्षा और जागरूकता अभियानों ने इसे रोकने में काफी हद तक सफलता प्राप्त कर ली है. फिर भी कई ऐसे समुदाय हैं जो आज भी इससे उभर नहीं पाए हैं. ओडिशा के कोरापुट में इस प्रथा को रोकने का पूरा प्रयास किया जा रहा है.

आदिवासियों में बाल विवाह को रोकने के प्रयासों के तहत कोरापुट प्रशासन ने बाल संरक्षण समितियों का गठन किया है. कोरापुट जिला प्रशासन ने पिछले एक साल में आदिवासी समुदायों के बीच लगभग 65 बाल विवाह रोकने में सफल हुई है. परजा, गदाबा, भूमिया, भतरा, हलवा, सौरा और कोंध सहित आदिवासी समुदायों में बाल विवाह प्रचलित है, क्योंकि उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार लड़कियों की शादी 18 साल से कम और लड़कों की 21 साल से कम उम्र में होनी चाहिए.

यह प्रथा दूरदराज के इलाकों में अधिक तीव्र है दशमंतपुर, नारायणपटना, बंधुगांव, लक्ष्मीपुर, लामातापुट, पोट्टांगी, बोरीगुम्मा, कुंद्रा और बोइपरिगुडा इनमें यह काफी प्रचलित है. जिले भर में बाल विवाह को रोकने के प्रयासों के तहत, प्रशासन ने पंचायत प्रतिनिधियों, स्वास्थ्य और समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों और पुलिस के साथ जमीनी स्तर पर बाल संरक्षण समितियों का गठन किया.

समिति ने बाल विवाह के कई मामलों को सफलतापूर्वक रोका है और लड़कियों, लड़कों और उनके माता-पिता को ऐसे सामाजिक बंधन से रोकने के लिए परामर्श प्रदान किया है.

दशमंतपुर अखबाती मुस्का की बाल संरक्षण इकाई के आईसीडीएस पर्यवेक्षक-सह-सदस्य ने कहा, “हमने उनके माता-पिता द्वारा पारंपरिक अनुष्ठान करने से ठीक पहले बाल विवाह की घटना को रोका और उन्हें इसके खिलाफ कानूनी और दंडात्मक प्रावधानों के बारे में जागरूक किया.” उन्होंने कहा कि समिति द्वारा पिछले दो महीनों के दौरान लुल्ला पंचायत में ऐसे दो मामलों को रोका गया.

हालांकि, जमीनी स्तर पर बार-बार जागरूकता के प्रयासों और ब्लॉक और जिला स्तर पर निगरानी के बावजूद, आदिवासी माता-पिता द्वारा अपने नाबालिग बच्चों के भागने के बाद शादी को छुपाने के कारण ऐसे मुद्दे पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं. उन्होंने कहा, “बाल विवाह के बारे में जानकारी मिलने के बाद भी हमें दूर-दराज के गांवों में ऐसे मामलों को रोकने में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है, जहां आदिवासी लड़कियां अपनी जानकारी साझा किए बिना गांवों के युवाओं के साथ ‘उदलिया’ (नाबालिग लड़की को भगाना) करती हैं.”

उन्होने बताया कि विवाह के मुद्दे पर आगे की कार्रवाई के लिए हर महीने ब्लॉक और जिला स्तरीय संरक्षण समिति द्वारा समीक्षा की जाती है. बाल विवाह के जिला समन्वयक प्रसन्ना मिश्रा ने बताया, “हर तीन महीने में, हमें विभिन्न ब्लॉकों से बाल विवाह रोकथाम पर रिपोर्ट प्राप्त होती है, जिसकी अगले चरण निर्धारित करने के लिए जिला स्तर पर समीक्षा की जाती है.”

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