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सीएम योगी ने वनटांगियों के लिए लड़ी है लंबी लड़ाई, जानिए आगे की योजना

Posted on October 31, 2022 - 5:17 pm by

योगी आदित्यनाथ 1998 में गोरखपुर से सांसद चुने गए. तब से ही उन्होंने राज्य सरकार और संसद  पर वनटांगियों के मुद्दे लगातार उठाए. लोकसभा में वनटांगिया अधिकारों के लिए लड़ने वाले योगी ने 2007-08 में वन अधिकार संशोधन अधिनियम पास कराया. वनटांगियों को उनका अधिकार योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मिला. मुख्यमंत्री बनने के पहले ही साल अक्टूबर 2017 में उन्होंने वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाया. इससे गोरखपुर के 5 वनग्राम,  महराजगंज के 18 वनग्राम समेत प्रदेश के सभी वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा मिला. राजस्व ग्राम घोषित होने के साथ ही वनटांगिया गांवों के लोग हर तरह की सरकारी सुविधा के हकदार हो गए. अपने अब तक के कार्यकाल में मुख्यमंत्री योगी ने वनटांगिया गांवों को आवास, सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र और आरओ वाटर मशीन जैसी सुविधाएं मुहैया कराई हैं. वनटांगिया गांवो में सभी परिवारों के पास सीएम आवास योजना के तहत पक्का घर, कृषि योग्य भूमि, आधार कार्ड, राशन कार्ड, रसोई गैस कनेक्शन है. पात्रों को वृद्धा, विधवा, दिव्यांग आदि पेंशन योजनाओं का लाभ मिल रहा है. वनटांगिया बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं.

वनटांगिए लोगों के लिए 80 करोड़ के 288 विकास

24 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर के वनटांगिए गांव तीनकोनिया में विभिन्न ग्राम पंचायतों के लिए 80 करोड़ रूपये के 288 विकास कार्यों का शिलान्यास किया था. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा था कि आजादी के बाद भी वनटांगिया, मुसहर जैसे समुदायों को न्याय व अधिकार नहीं मिला था. उन्होंने कहा, ‘मैं 15 वर्षों से निरंतर इन लोगों के बीच आता रहा हूं. वनटांगिया, मुसहर लोगों के न्याय की लड़ाई को 2017 में मूर्त रूप तब मिला जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी. राजस्व गांव घोषित करने से लेकर जमीनों का पट्टा देने तथा ससम्मान जीवन यापन की व्यवस्था करने की पहल सरकार की तरफ से की गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथन का स्मरण करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि दीपावली की सार्थकता तभी है जब गरीब के घर भी दिया जले। प्रदेश सरकार इसी मंत्र के अनुरूप कार्य कर रही है.

कानून के शिकंजे से प्रताड़ित थे वनटांगिया समुदाय

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा था कि पहले वनटांगिया और मुसहर समाज को कौन जानता था. 15 साल पहले जब वनटांगिया लोगों के हक मांगने पर एक तरफ फॉरेस्ट विभाग दूसरी तरफ पुलिस के लोग प्रताड़ित करते थे. मूलभूत सुविधाएं कुछ नहीं थीं. अगर किसी ने मांग कर दी तो उसे कानून के शिकंजे में प्रताड़ित किया जाता था. अंततः सत्य व न्याय की जीत हुई. वनटांगिया तथा मुसहर समुदाय इसका साक्षी है. उपेक्षित रहे वनवासियों को आज आवास, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सभी सुविधाएं बेहतरीन तरीके से मिल रही हैं. 6 साल पहले वनटांगिया गांव में एक भी पक्का मकान नहीं था, सड़क नहीं थी, बिजली कनेक्शन नहीं थे. आज यहां सबके पक्के मकान बन गए हैं या प्रक्रिया में हैं. हर घर बिजली की रोशनी से जगमग है और हर तरफ सड़के नजर आती हैं. कोई भी किसी सुविधा से वंचित नहीं है. मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार राज्य के सभी 54 वनटांगिया गांव में सभी तरह की सुविधाओं का लाभ उपलब्ध करा रही है.

कौन है वनटांगिए समुदाय, क्या थी उनकी स्थिति

टांगिया गॉवों की उत्पत्ति बर्मा में उन्नीसवीं सदी  के मध्य में हुई, टांगिया शब्द बर्मीइस शब्द है और वनों को पुनः उगाने के तरीके के लिए व पहाड़ों पर अल्पकालिक खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता है. भारत में टांगियां पद्धति की शुरुआत सन् 1920 के आसपास हुई. युरोप के जंगलों का सफाया करने के बाद बरतानिया हुकूमत को जब उस समय उद्योग, कारखानों को  लगाने के लिये व कच्चे माल की पूर्ति करने के लिए व्यवसायिक लकड़ी की भारी ज़रूरत पड़ी और उन्हें भारत के भी ख़त्म होते जा रहे जंगलों को देख कर चिन्ता हुई. इसका जिक्र नैनीताल में हुई पहली टांगियां कान्फ्रेंस के दस्तावेजों में भी मिलता है. जिसमें लिखा है, कि टांगिया पद्धति से जंगल उगाने के लिये मज़दूरों को वनों के आस-पास बसने वाले गॉवां से लाया जाए. इसके लिये ज्यादहतर मज़दूर जिन गॉवों से लाए गए वहां वे मुख्यतः या तो भूमिहीन थे या फिर जमींदारों व बड़े काश्तकारों की ज़मीनों पर बेगारी करते थे.

क्या है वनटांगिए पद्दति का इतिहास

वर्ष 1853 से देश में रेलवे पटरियां बिछाई जाने लगीं थीं. रेल पटरियों के लिए स्लीपर की मांग काफी बढ़ गई थी. 1878 तक रेल लाइन बिछाने के लिए 20 लाख से अधिक कुंदों का प्रयोग हो चुका था. इसके अलावा रेल इंजनों में जलावन के रूप में लकड़ी का प्रयोग भी होता था.’ वन विभाग के 1882-83 की वर्षिक रिपोर्ट में जिक्र है कि ‘विभाग ने दो रुपये चार आना से लेकर दो रुपये छह आना प्रति स्लीपर की दर से पटना-बहराइच रेल लाइन की लिए लकड़ी आपूर्ति का ठेका दिया था.’ 1860 से 1890 के बीच यह नीति लाई गई कि जंगल साफ करने से अच्छा है कि इनका इस तरह से विकास किया जाए कि नियमित रूप से इमारती लकड़ी मिलती रहे. सखुआ और सागौन के जंगल तैयार करने के लिए अंग्रेजों को बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत थी. अंग्रेजों ने मुनादी कर मजदूरों को जंगल तैयार करने के लिए बुलाया. जमींदारी और जातीय उत्पीड़न से त्रस्त्र भूमिहीन अति पिछड़ी व दलित जाति के मजदूर जंगल में साखूआ-सागौन के पौधे रोपने के लिए चले आए. उन्हें गांवों से जंगल की तरफ पलायन उत्पीड़न से मुक्ति का मार्ग लगा लेकिन यहां आने के बाद वे अंग्रेजों हुकूमत के बंधुआ मजदूर हो गए.

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