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असम में हुए आदिवासी शांति समझौता में शामिल आदिवासी गुट के बारें में पूरी जानकारी?

Posted on October 1, 2022 - 1:00 pm by

विजय उरांव

केंद्र और असम सरकार ने गुरूवार 15 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजुदगी में राज्य के आठ आदिवासी विद्रोही समुहों के साथ त्रिपक्षीय शांति समझौते पर हस्ताक्षर तथा असम सरकार की ओर से मुख्यमंत्री डॉ विहिमंत विस्वा शर्मा ने समझौते पर हस्ताक्षर किया गया था।

गृहमंत्री अमित शाह ने समझौते पर कहा था कि यह असम और पुर्वोत्तर के लिए महत्वपुर्ण दिन है। इस क्षेत्र को शांत और विकसित बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कई प्रकार के कार्यक्रम हाथ में लिए थे, इनमें से अधिकतम सफल हो चुके है। आठ आदिवासी समुहों में ऑल आदिवासी नेशनल लिब्रेशन आर्मी, आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम, बिरसा कमांडो फोर्स, संथाल टाईगर फोर्स, आदिवासी पीपल्स आर्मी और नेशनल आर्मी के आलावा दो अन्य समुहों के करीब 1200 लोग हथियार छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हो रहे है। इस शांति समझौता की शुरूआत 10 साल पहले हुई थी, जिसे हस्ताक्षर के बाद यह औपचारिक हो गया। आदिवासी संगठन 2012 से ही सरकार के साथ संघर्ष विराम में है और तब से उग्रवादी संगठनों के कार्यकर्ता निर्धारित शिविरों में रह रहे है, जिसकी देखभाल सरकार कर रही है। इन समुहों के होने के दो कारण थे जिसमें पहला संवाद हीनता तथा दूसरा अलग हितो के टकराव के कारण ग्रुप-ग्रुप में और ग्रुप-पुलिस के बीच टकराव हुए जिसके कारण कई नागरिक, विद्रोही और सुरक्षाकर्मी मारे गए।

सभी विवादों का समाप्त करना भारत सरकार की प्राथमिकता

गृहमंत्री ने आगे कहा कि पुर्वोत्तर भारत की सभी विवादों को 2024 तक समाप्त करना उनकी प्राथमिकता है, चाहे वह राज्यों की सीमा विवाद हो या सशस्त्र विवाद। 2019 में NLFT(SD) के साथ समझौते की शुरूवात हुई था, 23 जनवरी 2020 में एनडीएफबी के साथ शांति समझौता किए थे, बोड़ो विवाद में 4000 लोग मारे गए थे, इस शांति समझौते में 1600 कैडरों ने आत्मसमर्पन किया था। 23 साल पुरानी ब्रु (रियांग) समझौता 2020 में की गई थी। समझौते में कार्बी क्षेत्र समझौता, असम-मेघालय सीमा समझौता शामिल है। 2022 में  पुर्वोत्तर भारत में लगभग 65 फीसदी सीमा विवाद समाप्त हो चुके है।

गृहमंत्री अमित शाह ने आदिवासी संगठनों से वादा किया है कि असम और पूरे पुर्वोत्तर भारत की संस्कृति का संवर्धन करना और विकास को गति देना मुख्य प्राथमिकताओं में है। चाय बगान और आदिवासी गांवो के लिए त्वरित विकास के कार्यक्रम शुरू होंगे, आर्म कैडरो के पुनर्वास के लिए आदिवासी कल्याण और विकास परिषद की स्थापना की जाएगी और चाय बगान के कामगारों के विकास के लिए 1000 करोड़ का विशेष पैकेज आदिवासी गांवों के मुलभूत सुविधाओं के लिए दिया जाएगा।

आदिवासियों को न्याय मिलेगा

असम के मुख्यमंत्री हिमंत विस्वा ने इस समझौते को खास बताया है और कहा है कि मेरा मानना है कि इस समझौते से ङमारे आदिवासी जनजाति के लोगों को समाजिक न्याय मिलेगा, आर्थिक विकास का एक बहुत बड़ा मौका मिलेगा और साथ ही राजनीतिक अधिकार भी मिलेगा।

गृह मंत्री के अनुसार प्रधानमंत्री के द्वारा पुर्वोत्तर में शांति और समृद्धि के लिए उठाए गए कदम पर भरोसा करके 2014 से अब तक 8,000 उग्रवादी हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल हुए है। दो दसकों में 2020 में उग्रवाद की कम घटना देखने को मिली है। 2014 की तुलना में, 2021 में उग्रवाद की घटनाओं में 74 फीसदी कमी आयी है। इस अवधी में सुरक्षा बलों की 60 फीसदी तथा आम नागरिकों की 89 फीसदी कमी दर्ज की गई है। पुर्वोत्तर राज्यों को ड्रग्स, उग्रवाद और विवाद मुक्त बनाने का प्रयास है।

ये है ग्रुप्स की प्रोफाईल

  1. ऑल आदिवासी नेशनल लिब्रेशन आर्मी

शुरूआत – 2006 में

उद्देश्य – चाय बगान के श्रमिकों की आदिवासी संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ने का दावा करता है, जिनके पुर्वजों को अंग्रेजी उपनिवेशवादियों के द्वारा पुर्वी भारत से लाया गया था, संगठन आदिवासी समुदाय के लिए अनुसूचित जनजाति के दर्जे की मांग और समुदाय के विस्थापित सदस्यों के पुनर्वास की मांग करता है।

क्षेत्र – असम के गोलाघाट और कार्बी एंगलोंग जिला तथा इसके अलावा कोकराझार और नागालैंड के दिमापुर शहर में

नेतृत्व – इसके चीफ कमांडर का नाम डेविड तिर्की उर्फ निर्मल है, इंटेलिजेंस रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2007 में झारखंड में देखा गया था, इसके नेता बिकास उर्फ राज मुंडा को गुवाहाटी में 10 दिसंबर 2007 को गिरफ्तार किया गया था। रूपेन लकड़ा को कार्बी जिले के बागजन में 8 जनवरी 2008 को गिरफ्तार किया गया था। प्रेम कवंर इस ग्रुप के मुख्य व्.क्तियों में है। इस कैडर में करीब 100 सदस्य है, आर्म कैडर 10 से अधिक नहीं है, इस ग्रुप से AK सीरिज के राईफल, कार्बिन, पिस्टल, 38 रिवोल्वर, ग्रेनेड लान्चर, SLRs रखने की सुचना थी, ULFA  ने IED  बनाने के लिए ट्रेनिंग दी थी।

फंडिंग – गोलाघट और कार्बी एंगलोंग में जबरन वसुली के द्वारा, ईस्टेट मैनेजरों को अगवा कर पैसे की वसुली(फिरौती) तथा खबर के अनुसार फिरौती के पैसे में एक हिस्सा United liberation front of india (ULFA) तथा National Socialist council of Nagaland- Isak-muivah (NSCN-IM) को भी जाता था।

लिंक – ULFA  और NSCN को फंड दिए जाने के अलावा, मनिपुर की Kuki revolutionary Army 5 हजार महिने पर ट्रेनिंग देता था व इस ग्रुप को हथियार भी बेचता था।

Source: South Asia terrorism portal के वेबसाईट से (satp.org)

  • आदिवासी कोबरा मिलिटेंट फोर्स

इस ग्रुप को आदिवासी कोबरा फोर्स के नाम से भी जाना जाता है, इस की शुरूआत 07 जुलाई 1996 में हुई थी, जब बोड़ो और संथाल संघर्ष में दोनों ओर से 100 लोग मारे गए थे।

उद्देश्य – सशस्त्र क्रांति के माध्यम से निचले असम के आदिवासी लोगों की रक्षा करने के कथित उद्देश्य से। इसके अलावा असम में ST सूची के रूप पहचान की मांग।

नेतृत्व और क्षेत्र – मुख्य नेता – दूर्गा मिंज, वरिष्ठ सदस्य जेबरिस खाखा और अन्य नेता कंडु मुर्मू, इस ग्रुप का संचालन कोकराझार और बोंगई गांव जिला से होता था, जो धुबरी जिले तक फैला। यह ग्रुप छिटपुट हत्याओं और वसुली में शामिल रही है।

लिंक और गतिविधि – कमाता लिब्रेशन संगठन (KLO) से लिंक, सुरक्षा दलों ने वर्ष 2000 में इस समुह के कैंप को नष्ट कर दिया था। 19 सितंबर से जनवरी 2002 में सरकार से बातचीत की कोशिश।

Source: South Asia terrorism Portal के वेबसाईट से (satp.org)

  • बिरसा कमांडो फोर्स  

प. बंगाल से 1997 में शुरू होकर 2012 में खत्म।

उद्देश्य – असम में अलग आदिवासी क्षेत्र की मांग, ST लिस्ट में जोड़े जाने की मांग, अपने समुदाय की सुरक्षा

नेतृत्व – दूर्गा हांसदा

क्षेत्र – धुबरी

  • संथाल टाईगर फोर्स

इस ग्रुप का काल – 1996 से 2014

बोड़ो संघर्ष में सरकार के द्वारा सुरक्षा नही दिए जाने पर हथियार उठाया।

उद्देश्य – बोड़ो संघर्ष में विस्थापित हुए 32 हजार आदिवासियों का पुनर्वास

क्षेत्र – कोकराझार

नेतृत्व – सिबलाल मुर्मू

Source: SRAO के फेसबूक पोस्ट से जिसमें सिबलाल मुर्मू की हत्या पर उनका पृष्ठभूमि लिखा गया था

  • आदिवासी पीपुल्स आर्मी

केंद्रीय तथा अपर असम (उत्तर असम) के क्षेत्र में ऑल आदिवासी नेशनल लिब्रेशन आर्मी, आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम, बिरसा कमांडो फोर्स, संथाल टाईगर फोर्स आदि संगठनों ने कमान संभाली हुई थी, दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र के लिए आदिवासी पीपुल्स आर्मी की शुरूआत हुई। 11 फरवरी 2005 में 5 लोगों से शुरू हुई यह ग्रुप 2010 तक 127 हो गई थी। 2012-13 में ST Status का आश्वासन के बाद सीजफायर कर दी गई।

नेतृत्व – विजय सिंह लकड़ा

ट्रेनिंग – ULFA  ने आदिवासी पीपुल्स आर्मी को भूटान में ट्रेनिंग दी।

फंडिंग – कृषि विभाग के व्यक्ति को अपहरण करके वहां से करोड़ो की फिरौती की मांग।

अन्य गतिविधि – 3 लोगों का किडनैप किया गया था, यह संगठन स्वयं बम बनाती थी, और आत्मघाती हमला। इनके संविधान के अनुसार आम लोगों पर हमला नही करना था लेकिन अगर करना पड़े तो वह अफसर या सरकारी कर्मचारी हो सकता था.

2011 में गुवाहाटी में कंचनजंघा एक्सप्रेस में बम प्लांट, उदलगुड़ी से तेजपुर के रेलरूट में बम प्लांट।

Source: Scroll.in में विजय सिंह लकड़ा के दिए गए साक्षत्कार से

बाकि तीन समुह AANLA(FG), BCF(BT), ACMA(FG) आदि मुख्य समुह के सब ग्रुप्स है।

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