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संविधान दिवस विशेष: भारत के संविधान सभा में शामिल थे ये आदिवासी नेता, जानिए इनके बारे में

Posted on November 26, 2022 - 4:08 pm by

विजय उरांव

वर्तमान राजनैतिक व सामाजिक बुनावट में पिछड़ा माने जाने वाले आदिवासी स्वतंत्र भारत की नींव के मजबूत ईकाई रहे हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े संविधान के निर्माण में उनका प्रभावी दखल रहा है. भारतीय संविधान सभा के 389 में से पांच आदिवासी थे. इनके नाम जयपाल सिंह मुंडा (वर्तमान झारखंड) के अलावा चार और आदिवासी थे. इनमें बोनिफेस लकड़ा (वर्तमान झारखंड), देवेंद्र सामंत( वर्तमान झारखंड), जेम्स जॉय मोहन निकोलस रॉय(वर्तमान मेघालय) और रामप्रसाद पोटाई (वर्तमान छत्तीसगढ़) हैं. उपर्युक्त 5 लोगों ने तत्कालीन भारत के लगभग 6 फीसदी आदिवासियों का प्रतिनिधित्व किया था.

1. जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह एक असाधारण छात्र, एक शिक्षक और औपनिवेशिक प्रशासक, एक उत्कृष्ट खिलाड़ी, एक शानदार वक्ता, एक दृढ़ निश्चयी राजनेता और आदिवासी अधिकारों के इतिहास में एक प्रमुख व्यक्ति थे. वे पूर्वी भारत में बिहार (वर्तमान झारखंड) प्रांत में मुंडा जनजाति के एक परिवार में छोटानागपुर क्षेत्र के एक छोटे से आदिवासी गाँव में 1903 में पैदा हुए. जयपाल सिंह ने गाँव के स्कूल और बाद में सेंट पॉल स्कूल में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की. जयपाल सिंह ने 1922 में मैट्रिक की परीक्षा पास की. उन्होंने 1926 में बीए किया, 1929 में एमए किया. वे कॉलेज की फुटबॉल टीम के सचिव और डिबेटिंग सोसाइटी के अध्यक्ष बने. वहां उन्होंने विश्वविद्यालय की हॉकी टीम में और फिर बाद में भारत की राष्ट्रीय हॉकी टीम में योगदान दिया.

jaipal singh munda

जयपाल सिंह मुंडा ने अखिल भारतीय आदिवासी महासभा की स्थापना की थी. जिसके द्वारा आदिवासियों के लिए अलग राज्य झारखंड के आंदोलन की शुरूआत हुई थी. जिसके निर्माण में आदिवासी अधिकारों और क्षेत्रों की पुष्टि एक प्रतिष्ठित सिद्धांत होना था. भारत की संविधान सभा में “छोटा नागपुर की आदिवासी जनजातियों” के प्रतिनिधि के रूप में प्रभावशाली बहस के लिए जयपाल सिंह मुंडा को ऑक्सफोर्ड की शिक्षा काम आयी. उन्होंने ऑक्सफोर्ड में सीखे अपने भाषण के कौशल का इस्तेमाल किया. जयपाल सिंह मुंडा का कहना था कि आदिवासियों की बेदखली अंग्रेजों के साथ शुरू नहीं हुई थी और उनके जाने के बाद समाप्त नहीं होगी. 

दिसंबर 1946 में संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा के द्वारा दिया भाषण

“मैं उन लाखों लोगों की ओर से बोलने के लिए खड़ा हुआ हूँ. जो सबसे महत्वपूर्ण लोग हैं, जो आज़ादी के अनजाने लड़ाके हैं, जो भारत के मूल निवासी हैं और जिनको बैकवर्ड ट्राइब्स, प्रिमिटिव ट्राइब्स, क्रिमिनल ट्राइब्स और जाने क्या-क्या कहा जाता है. पर मुझे अपने जंगली होने पर गर्व है क्योंकि यह वही संबोधन है, जिसके द्वारा हमलोग इस देश में जाने जाते हैं.

मैं जिस सिन्धु घाटी सभ्यता का वंशज हूँ. उसका इतिहास बताता है कि आप में से अधिकांश लोग जो यहाँ बैठे हैं, बाहरी हैं, घुसपैठिये हैं. इसके कारण हमारे लोगों को अपनी धरती छोड़कर जंगलों में जाना पड़ा. इसलिए यहाँ जो संकल्प पेश किया गया है, वह आदिवासियों को ‘लोकतंत्र’ नहीं सिखाने जा रहा. आप सब आदिवासियों को लोकतंत्र सिखा ही नहीं सकते, बल्कि आपको ही उनसे लोकतंत्र सीखना है. आदिवासी पृथ्वी पर सबसे लोकतांत्रिक लोग हैं.”

जयपाल सिंह मुंडा का ऐतिहासिक भाषण/प्रसार भारती

वर्ष 2000 में  दशकों के संघर्ष के बाद  झारखंड राज्य अस्तित्व में आया. लेकिन आदिवासियों के अधिकार को प्राथमिकता देने या उसकी रक्षा करने में विफल रहा. वर्तमान राजनीतिक गठन केवल जाति और वर्ग पदानुक्रम  और उत्पीड़न और बेदखली के राज्य-प्रायोजित पैटर्न को दोहराता है.

2. जेम्स जॉय मोहन निकोलस

जेम्स जॉय मोहन निकोल्स रॉय का जन्म 12 जून 1884 को वर्तमान मेघालय में शेला संघ में एक आदिवासी परिवार में हुआ था. जेम्स जॉय मोहन निकोलस जॉय भारतीय स्वतंत्रता सेनानी यु तिरोत सिंह के परपोते थे. वे अपनी उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता चले गए और बी.ए. 1904 में डिग्री. जॉय चर्च ऑफ गॉड के एक प्रमुख सदस्य थे,  ईसाई धर्म का एक संप्रदाय जो संयुक्त राज्य में शुरू हुआ था. जॉय 1921 में असम गवर्नर काउंसिल में पहले आदिवासी प्रतिनिधि बने.  वर्ष 1937 में  वे असम विधान सभा के लिए चुने गए.

जेम्स जॉय मोहन निकोलस रॉय

जॉय आदिवासियों के अधिकारों की वकालत के लिए जाने जाते थे. जॉय के कहने पर  नेहरू ने मेघालय में खासी-जैंतिया पहाड़ियों में एक क्षेत्रीय पार्टी बनाई.  जिसे खासी जयंतिया नेशनल फेडरेशन स्टेट कॉन्फ्रेंस (केजेएफएससी) के नाम से जाना जाता है. पार्टी का लक्ष्य पूर्वोत्तर भारत में आदिवासियों के लिए शासन में स्वायत्तता हासिल करना था.

संविधान निर्माण में योगदान:

जॉय कांग्रेस पार्टी के टिकट पर असम से संविधान सभा के लिए चुने गए थे. विधानसभा में  उन्होंने मुख्य रूप से आदिवासी अधिकारों और शासन पर हस्तक्षेप किया. उन्हें संविधान की छठी अनुसूची के पीछे अग्रणी माना जाता था,  जिसने उत्तर-पूर्व में आदिवासी क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों की स्थापना की थी.

6 सितंबर 1949 को संविधान सभा में पुर्वोत्तर भारत के लोगों पर नस्लीय टिप्पणी पर जेम्स जॉय मोहन निकोलस का भाषण

“उत्तरी कछार पहाड़ियों में कचारियों के एक वर्ग को छोड़कर  कोई भी जनजाति हिंदू धर्म या इस्लाम को नहीं मानती है, जो हिंदू धर्म का एक रूप है. तिब्बती बौद्ध धर्म को उत्तरी पहाड़ियों और बर्मन बौद्ध धर्म को तिराप फ्रंटियर ट्रैक्ट में पेश किया गया है. विशेष रूप से नागाओं, लुशाइयों और खासों में काफी संख्या में आदिवासी ईसाई हैं. बाकी आदिवासी एनिमिस्ट हैं. जीववादियों और अन्य लोगों के बीच कोई साम्प्रदायिक भावना नहीं है.”

हिंदू बीफ नहीं खाते लेकिन आदिवासी खाते हैं. मुसलमान सूअर का मांस नहीं खाते हैं लेकिन आदिवासी लोग खाते हैं. इसलिए ये लोग न तो हिंदू हो सकते हैं और न ही मुसलमान. सरकारी रिपोर्ट यह है कि पहाड़ियों के लोगों की अपनी संस्कृति है जो मैदानी इलाकों से काफी अलग है. सामाजिक संगठन गाँव, गोत्र और जनजाति का होता है और बाहरी रूप और संरचना आम तौर पर दृढ़ता से लोकतांत्रिक होती है. जाति या पर्दा की कोई व्यवस्था नहीं है और बाल विवाह का प्रचलन नहीं है.

तो वह पहाड़ी जनजातियों की संस्कृति है. भारत को उस भावना या समानता और वास्तविक लोकतंत्र के विचार के लिए उठना चाहिए जो आदिवासी लोगों के पास है. उन्हें एक पल के लिए भी यह नहीं सोचना चाहिए कि इन लोगों को अपने लोकतंत्र और समानता को छोड़ देना चाहिए और दूसरी संस्कृति द्वारा निगल लिया जाना चाहिए, जो उनकी आदत से काफी अलग है, और जिसे वे अपने समाज के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं मानते हैं.”

1959 में जॉय का निधन हो गया. वर्ष 2009 में  आदिवासियों के सशक्तिकरण की दिशा में उनके योगदान की मान्यता में खासी हिल्स स्वायत्त जिला परिषद के सामने रॉय की एक प्रतिमा स्थापित की गई थी.

3. बोनीफास लकड़ा

boniface lakra

बोनीफास लकड़ा का जन्म पिता सिलास लकड़ा व मां संतोषी के घर में लोहरदगा जिले के कुड़ू प्रखंड के दोबार गांव में 4 मार्च  1898 में हुआ था़. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई. वर्ष 1918 में मैट्रिक की पढ़ाई रांची के संत जॉन स्कूल में हुआ. ओड़िशा के रावेंसा कॉलेज में इंटर व पटना विश्वविद्यालय से बीए व एमए की डिग्री ली. यहीं से कानून की भी पढ़ाई पूरी की. उन्होंने सबौर कृषि महाविद्यालय में कृषि स्नातक का कोर्स पूरा किया, जिसके बाद रांची के संत जॉन स्कूल में कुछ समय तक शिक्षक के रूप में कार्य किया़ कुछ वर्षों तक आकाशवाणी, रांची से भी जुड़े रहे.

बोनीफास लकड़ा ने वर्ष 1937 में रांची में वकालत शुरू की.  वर्ष 1932-33 में कैथोलिक सभा की नींव रखी. रांची सामान्य सीट से कैथोलिक सभा के प्रत्याशी के रूप में विधायक (बिहार प्रोविंसियल असेंब्ली के सदस्य) चुने गये. आदिवासियों के लिए सुरक्षा प्रावधानों को संविधान में शामिल करवाने में अहम भूमिका निभायी़. उन्होंने संविधान सभा में छोटानागपुर प्रमंडल (रांची, हजारीबाग, पलामू, मानभूम, सिंहभूम) व संताल परगना को मिलाकर स्वायत्त क्षेत्र बनाने, इसे केंद्रशासित राज्य का दर्जा देने. सिर्फ आदिवासी कल्याण मंत्री की नियुक्ति, जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) के गठन की समय सीमा तय करने, पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में सभी सरकारी नियुक्तियों पर ट्राईबल एडवाइजरी कमेटी (टीएसी) की सलाह व उसके अनुमोदन, विशेष कोष से अनुसूचित क्षेत्रों के समग्र विकास की योजनाएं लागू करने और झारखंडी संस्कृति की रक्षा की पुरजोर वकालत की थी़. उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा के साथ खुलकर अपने विचार रखे़. बोनिफास लकड़ा का 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.

4. देवेंद्रनाथ सामंत

पद्मश्री देवेंद्र नाथ सामंत पश्चिमी सिंहभूम के दोपाई गांव के थे. मुंडा जनजाति के थे. संविधान सभा में इन्होंने आदिवासी हितों की बात मजबूती से रखी. उन्हें 25 सितंबर 1925 को चाईबासा में महात्मा गांधी से मिलने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया. वर्ष 1925 के अंतिम महीने में उन्होंने चाईबासा के बार एसोसिएशन का सदस्य बन कर जिला अदालत में वकालत शुरू की.

देवेंद्रनाथ सामंत

वर्ष 1927 में सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और 1952 तक लगातार इस क्षेत्र में काम किया. वे कांग्रेस से जुड़े थे. इस अवधि में बिहार-उड़ीसा लेजिसलेटिव काउंसिल, बिहार विधानसभा, बिहार विधान परिषद, संविधान सभा के सदस्य और संसद सचिव के रूप में कार्य किया. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के लिए राजबंदी के रूप में नौ सितंबर 1942 को गिरफ्तार हुए और 11 फरवरी 1944 तक हजारीबाग जेल में सजा काटी.

5. रामप्रसाद पोटाई

छत्तीसगढ़ के प्रख्यात गांधीवादी नेता ठाकुर रामप्रसाद पोटाई का जन्म कांकेर जिला के कन्हारपुरी गाँव में 1920 में हुआ था. उनकी आरम्भिक शिक्षा कांकेर रियासत के कॉफर्ड हाईस्कूल में हुई. उन्होंने बी.ए. एवं एल एल.बी. की डिग्री मोरिस कॉलेज नागपुर में प्राप्त की. धमतरी तहसील के सिहावा तथा राजनांदगाँव के बदराटोला आदि सत्याग्रहों में इन्होंने कांकेर रियासत के किसानों के शिक्षित नवयुवकों को प्रशिक्षित कर भाग लेने हेतु तैयार किया था. रामप्रसाद पोटाई इंग्लैंड से पढ़ाई की थी. पोटाई ने रायगढ़ एवं राजनांदगाँव आदि रियासतों में चल रहे संघर्ष की भाँति बस्तर एवं कांकेर रियासतों में भी जनजातियों को संघर्ष हेतु प्रेरित किया.

राम प्रसाद पोटाई ने 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में भाग लिया. वे सुभाष चन्द्र बोस के समर्थक थे, किन्तु कांग्रेस से उनके त्यागपत्र के पश्चात् वे पुनः कांग्रेस के लुधियाना अधिवेशन में गांधीजी से मिलने गये. गांधीजी से प्रेरित होकर वे ‘रियासती कृषक प्रजा परिषद्’ के गठन की दिशा में सक्रिय हो गये. 1939-45 के द्वितीय विश्व-युद्ध के समय, कांकेर रियासत भी जनता से बेगार, पट्टानवीसी तथा नजराना वसूलने के लिए उनका उत्पीड़न कर रही थी, के विरुद्ध पोटाई ने किसानों को विनम्र प्रतिरोध हेतु संगठित किया. वे 1939 में कांकेर नगरपालिका के नामजद सदस्य भी रहे. इस मध्य उन्होंने जगदलपुर, धमतरी, रायपुर आदि के प्रतिनिधियों के सहयोग से रियासतों में आदिवासियों के विकास हेतु अपना कार्य जारी रखा.

राम प्रसाद पोटाई

1942-1946 के मध्य उन्होंने कांकेर, नरहरपुर तथा भानुप्रतापपुर में युवकों के साथ “गांधीवादी राष्ट्रीय वाचनालय तथा खद्दर प्रचारक क्लब “की स्थापना करके राष्ट्रवादी गतिविधियों का संचालन किया. वर्ष 1946 में, सी.पी. एंड ओरिसा रियासती लोक परिषद् से मध्यप्रांत देशी राज्य लोक परिषद् अलग हो गया. जिसके अध्यक्ष ठाकुर प्यारे लाल सिंह बने. वर्ष 1946 में कांकेर रियासत-किसान सभा का गठन हुआ. वे किसानों एवं ग्रामीण युवकों को रियासत के विलय हेतु सक्रिय आन्दोलन चलाने, संगठित करने लगे.

अगस्त 1947 में देश की आजादी के साथ ही भारत की अन्य रियासतों की भाँति, कांकेर रियासत को भी, वहाँ के नरेश ने स्वतंत्र घोषित कर दिया था. जिसके विरोध में सितम्बर 1947 में कांकेर स्टेट कांग्रेस को बदलकर किसान सभा के बदले स्थापित किया गया. जिसके अध्यक्ष राम प्रसाद पोटाई बने थे. ठाकुर राम प्रसाद पोटाई ने रियासती विलय के मसले को संविधान सभा में प्रखरता से उठाया था जिसके फलस्वरूप मध्य प्रांतीय रियासतों का प्रांतीय जिलों में विलय करने का मसला राष्ट्रव्यापी मुद्दे के रूप में सम्मिलित किया गया था. इन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ की नांदगाँव, सक्ती तथा रायगढ़ रियासतों में “जन आंदोलन “प्रबल होने लगा था. ठाकुर राम प्रसाद पोटाई (कांकेर) तथा पं. सुंदर लाल त्रिपाठी (बस्तर) के प्रयासों से इन जिलों की रियासतों में भी जन आंदोलन उग्र हो उठा था.

ऐसी स्थिति में रियासत विभाग के प्रमुख मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल 15 दिसम्बर, 1947 को नागपुर पहुंचे जहाँ मध्य प्रांतीय रियासतों की विलीनीकरण वार्ता आयोजित की गयी। ठाकुर रामप्रसाद पोटाई तथा किशोरी मोहन त्रिपाठी ने मध्य प्रांत की रियासतों के विलीनीकरण की माँग हेतु ‘मेमोरेंडम’, सरदार पटेल को सौंपा था. वर्ष 1948 में भारतीय संविधान समिति के सदस्य के रूप में मनोनीत किए गए. संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी. जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि और 93 अलग-अलग रियासतों के प्रतिनिधि थे.

रामप्रसाद पोटाई की फोटो लाल घेरे में

रामप्रसाद पोटाई संविधान मामलों के विद्वान थे. उन्हें रियासत के प्रतिनिधि के तौर पर चुना गया था. प्रारूप समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने भारतीय संविधान की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. उन्होंने आदिवासियों के लिए संविधान सभा में आवाज उठाई. 1950 में वे कांकेर के “प्रथम सांसद”  मनोनीत हुए थे. बाद में भानुप्रतापपुर के “प्रथम विधायक” भी रहे. कैबिनेट मिशन योजना के तहत भारतीय समस्या के निराकरण के लिए चुने गए थे. वे “भारतीय संविधान सभा “में रियासत की जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. बहुत सारे प्रावधान उस समय लागू हुए. खास तौर से पोटाई ने आदिवासियों के उत्थान के लिए काम किया। रामप्रसाद पोटाई “श्रम कानून “के जानकार थे. वो चाहते थे कि यहां के मजदूरों को उनके श्रम का वाजिब मूल्य मिले. रामप्रसाद पोटाई संविधान सभा के सदस्य बने थे, तब गांव वाले बेहद खुश हुए थे. जब विधायक बने तब भी लोगों ने किसी त्योहार की तरह जश्न मनाया था. 6 नवंबर 1962 की अल्पायु में उनका देहांत हो गया.

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