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झारखंड: आदिवासी राष्ट्रपति और सीएम के रहते में खत्म किये जा रहे संवैधानिक अधिकार

Posted on November 26, 2022 - 10:22 pm by

राज्य सरकार पेसा नियमावली बना रही है. देर से ही सही, राज्य के लिए यह जरूरी है. लेकिन इस नियमावली में कई ऐसे प्रावधानों के छोड़ दिया गया है, जो राज्य के आदिवासी को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों को पूरी तरह खत्म कर देगा. आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के राष्ट्रीय संयोजक विक्टर माल्टो ने 26 नवम्बर को संविधान दिवस पर राँची प्रेस क्लब में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कही.

इसके साथ आदिवासी बुद्धिजीवी मंच ने इस बात पर चिंता जतायी है कि आदिवासी राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री के होते हुए भी झारखंड में आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार खत्म किये जा रहे हैं.

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच की ओर से राज्य सरकार से अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाओं और नगर पालिकाओं को भंग करने की मांग की. बुद्धिजीवी मंच ने इसे यह असंवैधानिक बताया है. जिसमें कहा है कि भारत के संविधान के भाग ix के अनुच्छेद 243 एम (1) और भाग ix A के अनुच्छेद 243 (जेडसी) के तहत अनुसूजित क्षेत्रों में पंजायती राज व्यवस्था और नगर निगम, नगरपालिकाओं का गठन या चुनाव कराने की संवैधानिक रोक है.

वहीं संसद में अनुच्छेद 243 एम (4बी) द्वारा अपवादों एवं उपान्तरणों के अधीन विशेष अधिनियम पेसा 1996 लाया गया, जिसमें 23 प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों में अपवादों के अधीन विस्तार दिया गया है.

बुद्धिजीवी मंच ने आगे कहा कि पेसा अधिनियम 1996 की धारा 4 में स्पष्ट लिखा गया है कि राज्य विधायिका उपरोक्त 23 प्रावधानों को असंगत कोई भी कानून नहीं बना सकता है. जो नियमावली बनाई जा रही है, उसमें राज्य सरकार ने उन सभी प्रावधानों को हटा दिया है, जिसके द्वारा आदिवासी, जल-जंगल -जमीन, वन संपदा और उनकी रीति-रिवाज, क्षेत्र की खनिज संपदाओं की रक्षा हो सकती थी.

इसके अलावा उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने अधिनियम की धारा 4 (M)(iii) ,(vii) द्वारा आदिवासी भूमि हस्तांतरण एवं वापसी और जनजातीय उपयोग पर भी नियमावली तैयार नहीं किया है. इसका साफ मतलब है कि सरकार अपनी ही जमीन से बेदखल हो रहे आदिवासियों को लेकर संजीदा नहीं है.


अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा अधिनियम की धारा 4(0) और धारा 4 (एम) में जिला स्तर पर स्वशासीजिला/ क्षेत्रीय परिषद और निचले स्तर पर परंपरागत ग्राम सभा की स्थापना अनिवार्य है. ये दो संस्थाओं के द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन नियंत्रण सुनिश्चित किए जाने थे. इनके पास कुल 7 शक्तियां प्राप्त हैं. लेकिन झारखंड सरकार ने अनुसूचित क्षेत्रों पर असंवैधानिक ढंग से सामान्य पंचायती राज व्यवस्था और नगर निकाय पालिकाओं की स्थापना कर दिया है. जिसके कारण जनजातियों के कस्टमरी लॉ व परंपरागत रीति रिवाज की प्रशासनिक व्यवस्था पर संकट उत्पन्न हो गया.

मंच ने कहा कि राज्य सरकार के 2 फरवरी 2022 के पत्र में पेसा नियमावाली बनाने की बात कही गई है. ऐसे में राज्य सरकार को बताना जाहिए की कैसे बिना नियमावली के पंचायत चुनाव कराये गये. इसके साथ मंच ने 2010, 2015 और 2022 में अनुसूचित क्षेत्रों में कराये गये चुनाव को असंवैधानिक बताया है. और इसपर सरकार से जबाव मांगी है.

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