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पुण्यतिथि : डॉ रामदयाल मुंडा ने झारखंड के आदिवासियों की संस्कृति को विश्व पटल पर पहचान दी

Posted on September 30, 2022 - 6:58 am by

जीवन परिचय

आदिवासी समुदायों और चुनौतियों की तरफ दुनियाभर के जिन आदिवासी विद्वानों ने संयुक्त राष्ट्र संघ तक ध्यान पहुंचाया, उन्हीं में से एक थे “डॉ रामदयाल सिंह मुंडा”। मुंडा एक विश्वस्तरीय भाषाविद्, साहित्यकार, संगीतज्ञ, आदिवासी कार्यकर्ता व सिद्धांतकार, पुरखा गीतों के जानकार और तरह – तरह के प्रतिभाओं से संपन्न थे। डॉ रामदयाल मुंडा का जन्म 23 अगस्त 1939 को रांची के बुंडु स्थित दिउड़ी गांव में हुआ था। उन्होंने हाई स्कूल की पढ़ाई खूंटी से की तथा रांची विश्वविद्यालय से नृविज्ञान (Anthropology) परा स्नातक की। 1963 – 70 तक अमेरिका के शिकागों विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान(linguistics) में परा स्नातक  और पीएचडी की तथा वहीं पर मिनेसोटा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। इसके बाद 1981 से 99 तक रांची विश्वविद्यालय में रांची विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। इसी दौरान सन् 1991 में रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की उन्होंने स्थापना की। यह विभाग (जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग) पूरे भारत में पहला ऐसा विभाग था। इस विभाग ने सिर्फ अध्ययन और शोध को बढ़ावा दिया बल्कि आदिवासी भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण और प्रोत्साहन में भी भरपूर भूमिका अदा की। 1985 में रांची विश्वविद्यालय के कुलपति बनाये गए।

डॉ रामदयाल मुंडा के दो अवधारना की चर्चा हमेशा होती है, “जे नाची से बाची” और “माय, माटी और मान” इस सिद्धांत को डॉ मुंडा ने आत्मसात् ही नही किया बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा भी बना लिया। डॉ रामदयाल मुंडा का प्रेम विवाह अमेरिका में 14 दिसंबर 1972 को हेजेल एन्न लुत्ज हुआ था, भारत लौटने के बाद रिश्ता टुटा, फिर हेजेल से तलाक के बाद 28 जून 1988 को दूसरा विवाह अमिता मुंडा से हुआ, जिससे उनका एक बेटा है- गुंजल इकिर मुंडा।

आदिवासी गीतों, परंपपराओं, रीति रिवाजों के संरक्षण तथा विकास को हमेशा ही महत्व दिया और उसका नेतृत्व भी किया। झारखंड के मुंडा पाईका मुंडा नृत्य को उन्होने दूनियाभर में पहचान दिलायी, इसके साथ ही सोवियत रूस, अमेरिका, चीन, जापान, फिलींपींस आदि देशों की यात्रा भी की और झारखंड की संस्कृति को दूनियाभर में बिखेरा।

डॉ मुंडा दूनियां के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों से जुड़े रहे। शिकागों और मिनेसोटा जैसे विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य किया, ऑस्ट्रेलियन युनिवर्सिटी कैनबेरा और न्युयॉर्क के सिराक्युज विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर जुड़े रहे। युनाईटेड नेशन के विभिन्न समितियों में काम किये ।

30 मार्च 2011 को डॉ रामदयाल मुंडा का देहांत दूर्भाग्यपुर्ण कैंसर से हुई जब वे रांची में नागाड़ा बजाते हुए अपने साथियों के साथ झुम रहे थे।

2007 में संगीत नाटक अकादमी का सम्मान दिया गया था, 2010 में रामदयाल मुंडा को पद्मश्री का सम्मान दिया गया था, झारखंड आंदोलन(अलग झारखंड राज्य की मांग) से जुड़े रहे, 2007 में राज्यसभा सांसद बने थे। रामदयाल मुंडा के नेतृत्व में झारखंड पीपुल्स पार्टी नामक राजनीतिक दल का निर्माण हुआ था।  उनकी प्रमुख किताबों में The Jharkhand movement  : Indigenous peoples struggle for Autonomy in india, आदि धर्म, बा:हा बोंगा/सरहुल मंत्र, सोसोबोंगा, अरांदि बोंगा, हिसिर, आदिवासी अस्मिता और झारखंडी अस्मिता के सवाल तथा The Other Side Of Development : The Tribal story आदि है।  

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