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शेडमाके बलिदान दिवस: अंग्रेजों से लड़ने के लिए 500 गोंडो की सेना बनायीं

Posted on October 21, 2022 - 5:36 pm by

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले का भी अमूल्य योगदान रहा है. आजादी के लड़ाई में चंद्रपुर के माटीपुत्रों ने अपने प्राण हंसते हुए न्यौछावर कर दिए और इतिहास में अमर हो गये. उनके नाम, कार्य,  बलिदान को भले ही हमारे इतिहासकारों ने कम आंका लेकिन इन वीरों की वीरगति को वे नकार नहीं पाये. न जाने ऐसे कितने ही आदिवासी वीर अपनी जन्मभूमि की लाज को बचाते हुए शहीद हो गये लेकिन इतिहास में उनके नाम भी विरले ही हैं. चंद्रपुर जिले के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर शहिद बाबुराव शेडमाके का बलिदान दिवस है.

बाबुराव पुल्लेसूरबापू शेडमाके का जन्म 13 मार्च 1833 को किष्टापुर में हुआ था. पिता का नाम पुल्लेसूर तथा माता का नाम जुरजाकुवर था. उनके पिता पुल्लेसूर उस समय अहेरी घोट के जमींदार थे. गोंड परंपरा के अनुसार वीर बाबुराव पुल्लेसूर शेडमाके की शुरूवाती पढ़ाई लिखाई घोटुल (गोंड आदिवासियों का शिक्षा का केंद्र) में हुई जहाँ पर उन्होंने गोंडी, हिंदी, तेलुगु,मराठी आदि की शिक्षा व गीत,संगीत, नृत्य और कोयतुर संस्कार का ग्रहण किया. आगे की अंग्रेजी पढ़ाई के लिए उसके पिता ने उन्हे रायपुर (वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी) भेज दिया. पढ़ाई के बाद शेडमाके वापस मोलापल्ली आ गए. उसके बाद वैवाहिक जीवन का आरंभ किया.

शेडमाके ने देखा कि अंग्रेज लुट मचाए हुए है. आदिवासियों पर अत्याचार कर रहे है. इसके साथ ही धार्मिक स्थितियों को बिगाड़ने में लगे हुए है. जब 1854 में चंद्रपुर ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आया तो शेडमाके ने अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाई. शेडमाके गुरिल्ला युद्ध की नीति अपनायी. 1857 में शेडमाके ने 500 गोंड आदिवासियों की सेना बनाकर उन्हे लड़ने के लिए तैयार किया. उन्होने सेना लेकर राजघड क्षेत्र से अंग्रेजो को भगाया और अपना कब्जा जमा लिया. इससे चंद्रपुर में स्थित कलेक्टर मि. क्रिक्टन घबराया और लड़ने के लिए ब्रिटिश सेना भेज दिया. लेकिन नन्दगांव घोसरी में ही शेडमाके की सेना ने ब्रिटिश सेना क ढ़ेर कर दिया. मि. क्रिक्टन ने फिर से सेना भेजा लेकिन इस बार फिर संगनापुर और बामनपेट में ब्रिटिश सेना को शेडमाके ने हरा दिया.

इन दोनों जीत से शेडमाके का मनोबल बढ़ा. उन्होंने 29 अप्रैल 1858 को चिंचगुडी स्थित मि. क्रिक्टन टेलीफोन शिविर पर आक्रमण कर दिया. इस आक्रमण में टेलीग्राफ ओपरेटर्स मि. हॉल और मि.गार्टलैंड मारे गए थे. जबकि मि. पीटर वहां से भागने में कामयाब रहा. उसने पूरी घटना की जानकारी मि. क्रिक्टन को बताई. मि. क्रिक्टन ने शेडमाके को गिरफ्तार करने के लिए कूटनीतिक चाल चली. एक तरफ वह नागपुर के कैप्टेन शेक्सपियर्स से उन्हे पकड़ने के लिए पूछ रहे थे और दूसरी तरफ वह अहेरी की जमींदारनी रानी लक्ष्मीबाई से उसे पकड़ने का दवाब बना रहे थे. शेडमाके इससे वाकिफ नहीं थे. 18 सितंबर 1858 को शेडमाके को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें चंडा सेंट्रल जेल लाया गया. 21 अक्टूबर 1858 को बाबूराव पुलेश्वर शेडमाके को चंडा के खुले मैदान में फांसी दे दी गई.

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