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हसदेव अरणय: विकास के रास्ते में नहीं आएंगे – सुप्रीम कोर्ट

Posted on December 22, 2022 - 11:45 am by

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की छत्तीसगढ़ स्थित परसा खदान और हसदेव क्षेत्र के विकास को रोकने की याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के जैव-विविधता वाले हसदेव अरण्य में अदानी समूह द्वारा संचालित और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के स्वामित्व वाली कोयला खनन परियोजना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है और कहा है कि वह विकास के रास्ते में नहीं आएगा.

पर्यावरण संबंधी चिंताओं और जनजातीय अधिकारों पर खनन गतिविधियों के प्रभाव को लेकर इस क्षेत्र में आदिवासी समुदाय लंबे समय से विरोध करते रहे हैं. जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कोई अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं को कोयला खनन गतिविधियों के खिलाफ किसी भी तरह के प्रतिबंध के रूप में नहीं माना जाएगा.

विकास के रास्तें में नहीं आना चाहते

पीठ ने कहा, ‘‘हम विकास के रास्ते में नहीं आना चाहते हैं और हम इस मामले में बहुत स्पष्ट हैं. हम कानून के तहत आपके अधिकारों का निर्धारण करेंगे लेकिन विकास की कीमत पर नहीं.’’ पीठ ने हाल के एक आदेश में कहा, ‘‘अंतरिम राहत से इनकार किया जाता है. हम स्पष्ट करते हैं कि इन अपीलों का लंबित रखा जाना परियोजना (परियोजनाओं) के आड़े नहीं आएगा. अगर इस न्यायालय को अपीलकर्ताओं की ओर से दी गई दलीलों में दम नजर आता है तो प्रतिवादियों को क्षतिपूर्ति के लिए कभी भी निर्देश दिया जा सकता है.’’

सुप्रीम कोर्ट परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली स्थानीय निवासियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था. भारत सरकार ने 2015 में छत्तीसगढ़ में परसा ईस्ट और केटे बासेन (पीईकेबी) में 15 एमटीपीए कोयला ब्लॉक और राजस्थान को परसा में 5 एमटीपीए क्षमता आवंटित की थी.

क्या है पूरा मामला?

छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य में कोयला खदानों को राज्य सरकार से अनुमति दिए जाने के बाद लगातार आदिवासी आंदोलन कर रहे हैं. सरगुजा, कोरबा और सूरजपुर ज़िले में फैला हसदेव अरण्य देश के सबसे विविध और खूबसूरत जंगलों में से एक है. इस इलाक़े में कोयला खादानों में खनन की प्रक्रिया के लिए लाखों पेड़ काटे जाएँगे.

आदिवासियों का कहना है कि कोयले के खनन की वजह से हसदेव अरण्य के 8 लाख पेड़ों को काटा जाना है.

स्थानीय गोंड आदिवासी समाज के लोग बताते हैं कि जब साल 2011 में इस परियोजना को हरी झंडी दी गयी थी, उस समय से ही स्थानीय लोग इसका विरोध कर रहे हैं. उससे पहले वर्ष 2010 तक इस इलाक़े में खनन को प्रतिबंधित रखा गया था.

साल 2011 में तीस गांवों के लोगों ने कुछ सामजिक संगठनों के साथ मिलकर ‘हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति’ का गठन किया और खनन के खिलाफ संघर्ष करना शुरू कर दिया.

स्थानीय लोग बताते हैं कि जब 2011 में कहा कि खनन की इजाजत सरकार और पर्यावरण मंत्रालय ने दी तो ये स्पष्ट किया गया कि इन परियोजनाओं के अलावा इलाक़े में किसी और खनन परियोजना को मंज़ूरी नहीं दी जाएगी.

खनन का विरोध देशभर के आदिवासियों के लिए आम बात है, चाहे वो बुलडोज़र रोकना हो, या शांतिपूर्ण विरोध करना. इस विरोध का आदिवासियों को नुकसान भी झेलना पड़ा है. कभी उनकी गिरफ्तारी हुई है, कभी पिटाई, तो कई लोगों ने अपनी जान भी गंवाई है.

‘हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति’ की एक सार्वजनिक घोषणा में आरोप है कि सरकार ने आदिवासियों और जंगल के दूसरे निवासियों की रक्षा करने के बजाय खनन कंपनियों से हाथ मिला लिया है.

दरअसल, अप्रैल 2010 में छत्तीसगढ़ सरकार ने परसा ईस्ट और कांता बसन (PEKB) में 1,898.328 हेक्टेयर जंगल की ज़मीन के इस्तेमाल की सिफारिश की थी, और उसे राजस्थान राज्य विद्युत उत्पाद निगम लिमिटेड (RRVUNL) को सौंप दिया था.

जून 2011 में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन की फॉरेस्ट पैनल ने इस इलाके को इकोलॉजिकल तौर पर अहम मानते हुए यहां खनन पर रोक लगा दी. लेकिन उस वक्त के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस फ़ैसले को नज़रअंदाज करते हुए राज्य सरकार की सिफारिश को माना और जो इलाके कम घने और जहां जैवविविधता कम है, वहां खनन की अनुमति दे दी.

इस निर्णय को 2014 में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में चुनौती दी गई और आदेश के बाद RRVUNL द्वारा किए जा रहे खनन को स्थगित कर दिया गया.

एनजीटी के 2014 के आदेश के तहत ICFRE का एक स्टडी यहां होना था लेकिन 2019 तक यह काम शुरू नहीं हुआ. मई 2019 में संस्था ने ज़मीन पर काम शुरू किया जो कि फरवरी 2021 में ख़त्म हुआ है.

साभार : मैं भी भारत

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