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विभिन्न संस्थानों में कितने आदिवासियों ने भेदभाव का सामना किया, सरकार का जवाब..?

Posted on October 8, 2022 - 11:21 am by

विजय उरांव

मूल बिंदु

  • पांच वर्ष में आदिवासियों पर हुए भेदभाव/अत्याचार के आंकड़े
  • विभिन्न संस्थानों के विभागाध्यक्षों के खिलाफ दर्ज मामलों के बारें में मंत्रालय क्या कर रही है

विभिन्न संस्थानों में आदिवासियों के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर भाजपा के दौसा से लोकसभा सांसद जशकौर मीणा तथा अलवर से लोकसभा सांसद महंत बालकनाथ ने लोकसभा में जनजातीय कार्य मंत्रालय से अतारांकित सवाल संख्या AU2079 में (क) गत पांच वर्षों तथा चालू वर्ष के दौरान विभिन्न संस्थानों के विभागाध्यक्षों के विरूद्ध अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न से संबंधित दर्ज मामलो का ब्यौरा क्या है तथा इसकी जांच की क्या स्थिति है (ख) पीड़ितो को राहत पहुंचाने के लिए सरकार द्वार क्या कदम उठाए गए हैं तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा मामलों की जांच में पाए गए दोषी विभागाध्यक्षों के विरूद्ध क्या कार्यवाई की गई है। (ग) क्या सरकार ने उन संस्थाओं और विभागों के विरूद्ध कोई कार्यवाई की है जो राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और मंत्रालय द्वारा दिए गए आदेशों का पालन नहीं करते हैं, यदि हां, इसका ब्यौरा क्या है। (ड.) दिल्ली विश्वविद्यालय और मुक्त विद्यालयी शिक्षा सहित विभिन्न संस्थाओं में सरकारी आदेशों की जांच, नियमों की उपेक्षा तथा अन्य अनियमितताओं को रोकने के लिए सरकार द्वारा क्या कदम उठाए गए हैं। और (च) अनुसूचित जनजाति कर्मचारियों से संबंधित सरकारी नीतियों और दिशानिर्देशों को चुनौती देने वाली संस्थाओं के संबंध में सरकार की क्या नीति है। पर जानकारी मांगी थी। जिसके जवाब में जनजातीय कार्य राज्यमंत्री रेणुका सिंह सरुता ने 2 अगस्त 2021 को जानकारी दी है। जिसमें एनसीआरबी के आंकड़ो के अनुसार आदिवासियों पर किए गए अत्याचार 2015-19 तक दर्ज मामलों की संख्या 34,754 हैं, जिसमें 27,623 चार्जशीट मामले हैं, इन मामलों में 3,274 दोषी पाए गए, इसमें पीड़ितो की संख्या 36,843 हैं, गिरफतार किए गए व्यक्तियों की संख्या 49,786, चार्जशीट किए गए व्यक्तियों की संख्या 50,246 हैं तथा 4,852 लोगों को दोषी ठहराया गया।  हालांकि इस एनसीआरबी डाटा में विभिन्न संस्थानों के विभागाध्यक्षों के खिलाफ दर्ज ऐसे मामलों के बारें में मंत्रालय ने कोई जानकारी उपलब्ध नही कराई है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय और मुक्त विद्यालयी शिक्षा सहित विभिन्न संस्थानों में सरकारी आदेशों की जांच, नियमें की उपेक्षा पर सरकार का कहना है कि आंकड़े इकट्ठे किए जा रहे हैं।

एनसीआरबी के अनुसार 2015-19 तक 5085 रेप के मामले सामने आये है, वहीं 88 बार रेप करने की कोशिश की गई। 757 आदिवासियों की हत्या की गई। 4489 बार शील भंग करने के इरादे महिला आदिवासियों पर हमला किया गया। वहीं नवीनतम आकड़ों 2020 और 2021 की बात करे तो क्रमश: 172 और 206 हत्याएं है और 1148 बालात्कार (जिसमें 681 महिलाएं तथा 457 बच्चियां) तथा 1327 बालात्कार (812 महिलाएं तथा 515 बच्चियां) शामिल हैं।

संसद के द्वारा एक अधिनियम अर्थात् अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न सहित अनुसूचित जाति तथा  अनुसूचित जनजाति सदस्यों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के लिए अधिनियमित किया गया, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को अधिक न्याय दिलाने के उद्देश्य से, जनवरी 2016 में पीओए अधिनियम संशोधित किया गया। यह अधिनियम पीड़ितों को राहत/मुआवजा भी प्रदान करता है और देश में आईपीसी के सहयोजन से कानून कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा की जाने वाली कार्यवाई को भी निर्धारित करता है। भारत के संविधान के 7वीं अनुसूचि के तहत पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य के विषय है, इसलिए सभी राज्य सरकारें और संघराज्य क्षेत्र प्रशासन पीओए अधिनियम के प्रावधानों को लागु करते है। जिसमें अनुसूचित जनजातियों से संबंधित जाति आधारित उत्पीड़न और भेदभाव से संबंधित मामले शामिल हैं।

अनुसूचित जनजाति कर्मचारियों से संबंधित सरकारी नीतियों और दिशानिर्देशों को चुनौती देने वाली संस्थाओं के संबंध में सरकार का कहना है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण)(पीओए) अधिनियम, 1989 के प्रावधान को, 2016 में संशोधित किया गया है और यह देश के सभी हिस्सों में लागू है। कोई भी मामला जो सीपीजीआरएएमएस पोर्टल (Centralised Public Grievance Redress and Monitoring System) पर मंत्रालय के संज्ञान में आता है और प्रत्यक्ष अभ्यावेदन या अन्यथा को नियमों और विनियमों के अनुसार तत्काल कार्यवाई करने के लिए संबंधित अधिकारियों के साथ उठाया जाता है।

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