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अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस: आदिवासी भाषाओं के खत्म होने का सबसे अधिक खतरा – UN

Posted on February 21, 2023 - 12:22 pm by
Survival International.Org

हर साल 21 फरवरी को ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ मनाया जाता है. दुनियाभर की भाषाओं और सांस्कृतिक का सम्मान हो और इसके प्रति लोगों के अंदर प्रेम बना रहे इसलिए विश्व भर में आज के दिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है. इस दिन को मनाने का सबसे बड़ा उद्देश्य दुनियाभर में अपनी भाषा-संस्कृति (Language culture) के प्रति लोगों में रुझान पैदा करना और जागरुकता फैलाना है.
बता दें कि अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की अनोखी पहल बांग्लादेश द्वारा की गई थी.

भारत में मातृभाषाएं

भारत में 234 पहचान योग्य मातृभाषाएं, 121 भाषाएं और लगभग 22 आधिकारिक भाषाएं हैं. सिंधी, कोंकणी, नेपाली, मणिपुरी, मैथिली, डोगरी, बोडो और संथाली ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें संविधान में संशोधन के बाद संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया था. पहले 14 भाषाएं थीं जिन्हें शुरू में संविधान में शामिल किया गया था.

साल 2023 की थीम

जानकारी के मुताबिक इस बार अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का 24वां संस्करण है जो बहुभाषी शिक्षा ‘शिक्षा को बदलने की आवश्यकता’ विषय पर केंद्रित होगा. बता दें कि लोगों को मातृभाषा के प्रति जागरूक करने के लिए सरकार इस दिन कार्यक्रम का भी आयोजन करती है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार वर्तमान में विश्व की लगभग 6,700 भाषाओं में से 96 प्रतिशत भाषाएँ विश्व की केवल 3 प्रतिशत जनसंख्या द्वारा बोली जाती हैं. हालाँकि, आदिवासी लोगों का हिस्सा में वैश्विक आबादी का 6 फीसदी से भी कम हिस्सा हैं, लेकिन वे दुनिया की 4,000 से अधिक भाषाएँ बोलते हैं. संरक्षणवादी अनुमान बताते हैं कि दुनिया की आधी से अधिक भाषाएँ 2100 तक विलुप्त हो जाएँगी.

UN के रिपोर्ट के अनुसार अनुमान है कि इस सदी के अंत तक दुनिया की 95 प्रतिशत भाषाएँ विलुप्त हो सकती हैं या गंभीर रूप से संकटग्रस्त हो सकती हैं. अधिकांश भाषाएँ जो खतरे में हैं, आदिवासी भाषाएँ हैं. ऐसा अनुमान है कि हर दो सप्ताह में एक आदिवासी भाषा मर जाती है. आदिवासी भाषाएं न केवल संचार के तरीके हैं, बल्कि ज्ञान की व्यापक और जटिल प्रणाली भी हैं जो सहस्राब्दियों से विकसित हुई हैं. वे आदिवासी लोगों की पहचान, उनकी संस्कृतियों के संरक्षण, विश्वदृष्टि और दृष्टि और आत्मनिर्णय की अभिव्यक्ति के केंद्र में हैं. जब आदिवासी भाषाएँ खतरे में हैं, तो स्वयं आदिवासी लोग भी खतरे में हैं.


यह खतरा उपनिवेशवाद और औपनिवेशिक प्रथाओं का प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसके परिणामस्वरूप आदिवासियों, उनकी संस्कृतियों और भाषाओं का विनाश हुआ. आत्मसात करने की नीतियों, भूमि से बेदखली, भेदभावपूर्ण कानूनों और कार्यों के माध्यम से, सभी क्षेत्रों में स्वदेशी भाषाएं विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं.
यह वैश्वीकरण और सांस्कृतिक रूप से प्रमुख भाषाओं की एक छोटी संख्या के उदय से और बढ़ गया है. तेजी से, भाषाएं अब माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को प्रेषित नहीं की जाती हैं.


हाल ही में वर्ष 2016 में स्थायी फोरम की एक सिफारिश के जवाब में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2019 को आदिवासी भाषाओं के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष के रूप में घोषित किया. ताकि आदिवासी भाषाओं की महत्वपूर्ण हानि और उन्हें संरक्षित, पुनर्जीवित और बढ़ावा देने की तत्काल आवश्यकता पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर ध्यान आकर्षित किया जा सके.

बता दें कि वर्ष 2022 से 2032 तक संयुक्त राष्ट्र के द्वारा आदिवासी भाषाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय दसक के रूप में घोषित किया गया है.

Photo: Survival International

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