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इंटरव्यू: जानिए कौन हैं संजय कच्छप, जिनकी प्रधानमंत्री मोदी ने की तारीफ

Posted on November 29, 2022 - 6:17 pm by

लाइब्रेरी मैन के रूप में प्रसिद्ध झारखंड के संजय कच्छप की तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है. 26 नवंबर की मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संजय गरीब बच्चों के सपनों को नई उड़ान दे रहे हैं. चाइबासा निवासी संजय ने विद्यार्थी जीवन में पुस्तकों की कमी झेली थी, इसलिए उन्होंने ठाना कि वे किताबों की कमी के कारण किसी भी बच्चे का जीवन अंधकारमय नहीं होने देंगे. उन्होंने कोल्हान व अन्य जिलों में 50 से अधिक लाइब्रेरी का निर्माण कराया, इसके अलावा वे डिजिटल लाइब्रेरी का भी संचालन कर रहे हैं. लाइब्रेरी मैन संजय कच्छप से खास बात की है ट्राइबल खबर की संवाददाता नेहा बेदिया ने. प्रस्तुत है बातचीत के अंश..

आपके मन में पुस्तकालय बनाने का ख्याल कैसे आया? पुस्तकालय अभियान शुरू करने के पीछे क्या वजह रही?

इसके पीछे मेरे पारिवारिक हालात थे. विद्यार्थी जीवन में काफी समस्याएं आई. कॉलेज शुरू होते ही सोच लिया था कि जल्दी ही अच्छी नौकरी करनी है. लेकिन नौकरी की तैयारी के लिए मेरे पास किताबें नहीं थी. घर में बड़ा था, तो कई जिम्मेदारियां थी भी. किसी तरह से पढ़ाई पूरी की और कम्पटीशन की तैयारी की. मैंने मैट्रिक के बाद से ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था. आस-पास के झुग्गियों में रह रहे बच्चों को पढ़ाता था. वे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे. उनका नामांकन स्कूल में करवाया. बच्चों को पढ़ाते हुए मैंने अपनी तैयारी जारी रखी. अपने सहपाठियों को भी मैं पढ़ाता था. मेरे पास कोचिंग करने के भी पैसे नहीं थे और मेरा नामांकन नहीं हो सका. मैने सोचा कि जिस दिन मैं सक्षम हुआ, किसी को संसाधन की कमी के कारण शिक्षा से वंचित नहीं होने दूंगा. वर्ष 2008 में मेरा यह संकल्प पूरा हुआ.

आपके पुस्तकालय बनाने के सराहनीय कार्य में क्या दिक्कतें आईं और किन लोगों ने आपकी मदद की?

चूंकि ये नया कोन्सेप्ट था, इसलिए लोगों को पुस्तकों के बारे में व शिक्षा के महत्व को बताना और सबसे बड़ी बात थी. पुस्तकालय खोलने के लिए सामुदायक भवन की जरूरत थी. हमारे पुस्तकालय सामुदायिक भवन में चल रहे हैं. लेकिन अब जागरुक होने के बाद अपने घर का  हिस्सा भी दे रहे हैं. ताकि बच्चें वहां पढ़ें. लेकिन एक समय में सामुदायिक भवन भी देने के लिए तैयार नहीं थे.

समुदायिक भवन को, अपने मोहल्ला वाले भवन को पुस्तकालय में बदलने के लिए मुझे चार साल लग गए. जिस परिस्थिति में हमलोग थे, सोसाइटी में बहुत नकारात्मक सोच थी. स्लम एरिया जैसा क्षेत्र था, शिक्षा का दूर-दूर तक माहौल ही नहीं था. वहां पर लोगों को समझाने में काफी समय लगा. लेकिन लोग फिर समझ गए. इसके बाद सामुदायिक भवन हमलोग को मिला तो वहां 2008 से पुस्तकालय चला रहे हैं.

इससे पहले सामुदायिक भवन बंद पड़ा रहता था. लोग वहां नशापान करते थे, सोते थे और जुआ खेला करते थे. लोगों को लगता था कि उनका फ्रीडम छिन जाएगा. लोग पढ़ने लगेंगे तो शादी-ब्याह होगा तो सामान वगेरा कहां रखेंगे. ये सब चीजें समझाने में काफी समय लगा. लेकिन 2008 में पुस्तकालय स्थापित हुआ तो लोग वहां पढ़ने लगे और समाज की मानसिकता में बदलाव आयी. आज वो समय है जब पहले के दिनों और अब के दिनों में जमीन आसमान का फर्क दिखता है.

इसमें जो लोग समझते गए वे इस पुस्तकालय अभियान से जुड़ते गए. बहुत सारे शिक्षा प्रेमियों ने जो मेरे साथी है, सहयोग किया है. इनलोगों में किंदल पासवान, मिथिलेश कालंजी जिला कृषि पदाधिकारी जमशेदपुर, सिद्धार्थ शंकर, साधू शरण देवगम बीडीओ डुंबरिया, कृष्णा देवगम जैसे तमाम लोग बाद में धीरे-धीरे जुड़ते गए.

हम सभी आज मिल कर काम कर रहे हैं और आज 50 से ज्यादा पुस्तकालय कोल्हान और दूसरे जिलों में शुरू हो चुका है.

आज कल सभी के हाथों में मोबाइल है. खास तौर पर ट्राइबल और बैकवर्ड बच्चों में ये ज्यादा है कि वो लोग उससे अधिक महत्वपूर्ण चीजों को नहीं निकाल पा रहे हैं. इसके लिए हमने लाइब्रेरी को भी डिजिटल किया है. ताकि बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकें और किताब ढूंढ सके.

ज्ञान का मूल सोर्स किताब ही है. किताब के पठन पाठन का जो समाज में एक समस्या बन गया है कि लोग किताब नहीं पढ़ रहे हैं. लेकिन लाइब्रेरी बनने से पढ़ने पढ़ाने का एक इको-सिसटम डेवलप हो रहा है. इस बीच माननीय प्रधानमंत्री ने पुस्तकालय अभियान को,  ग्रामीण पुस्तकालय अभियान, डिजिटल पुस्तकालय अभियान को सराहा है तो इससे बहुत बल मिला है, खुशी मिली है.

इससे ऐसा लग रहा है कि हमलोग सही दिशा में काम कर रहे हैं. भले ही प्रधानमंत्री ने मेरा नाम लिया हो, लेकिन इससे पूरे टीम का जोश बढ़ा है. मेरे साथ-साथ समाज में सहयोगी चाहते हैं कि शिक्षा का माहौल बने. चूंकि सभी की नजर हम पर हैं तो लग रहा है कि अब जिम्मेदारियां बढ़ रही है. ऐसे जगह में भी काम करने का मन है जहां पर शिक्षा अपने मूल रूप में अभी तक नहीं     पहुंच पाई है. वहां जरूरतमंद बच्चे हैं जिन्हें किसी कारण से सुविधा नहीं मिल पा रही है, उन सुदूर क्षेत्रों में जा के उनकी मदद करें. उन्हें शिक्षा पहुंचाएं और एक समान अवसर भी दें जो शहर वाले बच्चों को मिल जाती है लेकिन गांव के बच्चों को नहीं मिल पाती है.

बहुत से बच्चे इतना सक्षम नहीं हो पाते हैं कि रांची दिल्ली जैसे इलाके में पढ़ सके. कम्पटिशन की तैयारी कर सके और करियर बना सके. इसके लिए हम ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल लाइब्रेरी भी डेवलप कर रहे हैं ताकि उन्हें समान अवसर मिले.

आपके अभियान के तहत पुस्तकालयों से लाभ ले चुके कुछ सक्सेस स्टोरिज  के बारे में बताइए.

ऐसी काफी लोग हैं, चूंकि डॉक्यूमेंटेशन  नहीं करते हैं, लेकिन जो लोग जुड़े हुए हैं. कभी आते हैं तो पता चलता है. जैसे रितेश तिग्गा जिसके पिताजी रिक्शा चलाते थे, वह अभी जमशेदपुर के कवाली थाना में दरोगा के रूप में पोस्टेड हैं. मनोज खलखों जिसका घर कभी राइस बियर से चलता था. आज वह रांची के इंडियन ओवरसीज में बैंक मैनेजर है. भोला तिर्की जिसके साथ भी ऐसी स्थिती थी.  आज वो रायगढ़ में ओडिट ऑफिसर हैं. विश्वनाथ कुजुर, जाफर इक्बाल, अरविंद रवि, पंकज रवि, अरुण प्रजापति आदि जैसे कई लोग हैं जिन्होंने कठिन परिस्थिती से उभर कर लाइब्रेरी के माध्यम से अच्छे मुकाम हासिल किए हैं.

पढ़ने के इच्छुक लोगों को किसी प्रकार का दिक्कत नहीं हो इसके लिए लाइब्रेरी में कई सुविधाओं का प्रबंध कराया गया है. प्रोजेक्टर, एलईडी टीवी, इंटरनेट के लिए फ्री वाई-फाई, इंवर्टर आदि जैसी सुविधाएं मुहैया कराई गई है. साथ ही समय-समय पर काउंसलिंग कराई जाती है, जिसमें आईएएस, आईपीएस सहित कई अन्य अधिकारियों को बुलाया जाता है. ये लोग बच्चों का मनोबल बढ़ाते हैं.

आपके इन पुस्तकालयों से लगभग कितने आदिवासी बच्चे लाभ उठा रहे हैं?

पांच हजार से ज्यादा बच्चे इन पुस्तकालयों का लाभ उठा रहे हैं. जिसमें सभी कम्यूनिटी के लोग शामिल हैं. आस-पास के जो भी जरूरतमंद बच्चे गांव, मोहल्ले के हैं,  उन सबको गाइड किया जाता है. लेकिन ज्यादा तर समस्याएं ट्राइबल क्षेत्र में ही हैं. हमारे ट्राइबल क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर बहुत नीचे है, तो हमारा ज्यादा फोकस है कि आदिवासी बच्चों को ज्यादा मोटिवेट करें. उनकी परिस्थिति, हालात और बैकग्राउंड के कारण उनको पढ़ाई में आगे लाना थोड़ा कठिन होता है और समय भी लगता है. इसलिए हमलोग आदिवासी बच्चों पर ज्यादा ध्यान देते हैं. लेकिन पढ़ने के इच्छुक सभी लोगों को मार्गदर्शन दिखाने में कोई कमी नहीं रहने देते हैं. यह लाइब्रेरी सभी के लिए समान है.

आपके इस अभियान के तहत और कितने लाइब्रेरी बनाई जा रही है? अभियान को लेकर आपके क्या विचार और लक्ष्य हैं?

हमलोग लाइब्रेरी की कोई गिनती नहीं चाहते हैं. हम एक हजार, चार सौ या पांच सौ लाइब्रेरी होने जैसी इच्छा नहीं रखते हैं. हम ये चाहते हैं कि समाज के मेधावी बच्चे हैं, जो किसी तरह से संसाधन के अभाव में दम ना तोड़े. किताबों और मार्गदर्शन की कमी से उसका सपना नहीं टूटे, यही मकसद है. इसके लिए हमलोग जीवन भर कार्य करते रहेंगे. इसे मैंने अपना पैशन भी बना लिया है और अपना जीवन का लक्ष्य भी बना लिया है. मेरे लिए ये है कि मैं अपने जैसा और सोचने वाले लोगों को पैदा करूं. मेरे सोच से प्रभावित होकर लोग मुझसे जुड़ें और खुद इनिसिएटिव लें. मेरा प्रयास यही रहेगा कि हर क्षेत्र में जहां जरूरत है वहां लाइब्रेरी मैन बने.

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