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आदिवासियों के पोट्रेयल को देखकर दर्द होता है: निरंजन कुजूर

Posted on December 12, 2022 - 9:21 pm by

यह कॉमन है कि आदिवासी स्टेट वायलेंस और अन्य वायलेंस को अपने अंदर दबाकर रखते हैं, यह बहुत समय तक उबलता है और आदिवासियों को वायलेंट होने में बहुत समय लगता है. आदिवासी जीवन में क्राइम रेट बहुत ही कम है. हर रोज जितना शहर में होता है. वो रेट बहुत हाई है. लेकिन न्यूज में आदिवासी क्षेत्रों में हमेशा वायलेंट एक्ट को ही हाईलाइट किया जाता है. जैसे आदिवासी नक्सल प्रभावित क्षेत्र आदि. आदिवासी क्षेत्रों में न्यूज में वायलेंस की ही बात आती है, तो ये एक परसेप्शन है. वो परसेप्शन जो बाहर के लोग फिल्म बनाते हैं तो वो उन्हीं चीजों पर हाईलाइट करते हैं. हम जब हाईलाइट करते हैं तो हम जीवन दिखाते हैं. आदिवासी फिल्म निर्देशक निरंजन कुजूर ने झारखंड लिटरेरी मीट में फिल्म चर्चा के दौरान कही.


झारखंड में रांची के ऑड्रे हाउस में 10 और 11 दिसंबर को टाटा स्टील की ओर झारखंड लिटरेरी मीट का आयोजन किया गया था. इस बातचीत में कवि अनुज लुगुन, अभिनेता अनुराग लुगुन और पुरूषोत्तम कुमार शामिल थे.


आदिवासी पोट्रेयल को देखकर दर्द होता है


निरंजन कुजूर ने आगे कहा कि हिंदी फिल्मों में आदिवासी पोट्रेयल को देखकर दर्द होता है. यह बहुत ही दूरी से देखा हुआ पोट्रेयल है जैसे सत्यजीत रे की फिल्म को क्रिटिसाइज करते हैं. एक फिल्म में सिमी गेरेवाल को काले रंग में पेंट करके आदिवासी दिखाया था. हमारी भी (आदिवासियों) एक सभ्यता हजारों सालों से है. मैं आपके सामने बैठा हू.

निरंजन कुजूर बाएं/फेसबुक निरंजन कुजूर


नदी के पझरा निकालना आदिवासी सर्वाइवल मेथड है

निरंजन आदिवासी सर्वाइवल मेथड का जिक्र करते हुए कहते हैं, जिसमें नदी के पझरा से आदिवासियों के द्वारा पानी निकाला जाता है, उसको लेकर बाहरी पॉइंट ऑफ व्यु से कहते हैं कि देखों गरीब हैं नदी पझरा निकाल कर पानी पी रहे हैं. लेकिन निरंजन कुजूर इस पर कहते हैं कि गरीब नहीं, बल्कि यह हमारा सर्वाइवल मेथड है. उसको लेकर कोई जॉब नहीं है. और हम जीते हैं. तो मुझे इस तरह का प्रेजेंट होना ज्यादा पसंद होगा. जिसके द्वारा सर्वाइवल किए हैं हमलोग और सामने बैठें हैं.
उसके विपरित बाहुबली में आदिवासियों का पोट्रेयल है जिसमें आदिवासियों की भाषा अफ्रीका के आदिवासी भाषा से प्रभावित होकर बनायी गयी है. दोनों के लड़ने की प्रक्रिया देख सकते हैं. तो इस तरह का पोट्रेयल सत्यजीत रे से लेकर अब तक. शालिमार में बात करते-करते आदिवासियों को गोली मारते हैं.
निरंजन कुजूर ने कहते हैं कि आदिवासियों के लिए Schedule Tribe का प्रयोग किया जाना Demeaning (नीचा दिखाने जैसा) है.

कौन है निरंजन कुमार कुजूर?
सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI), कोलकाता से सिनेमा स्नातक, निरंजन एक बहुभाषी फिल्म निर्देशक हैं. जिन्होंने कुडुख, संथाली, बंगाली, हिंदी और मंदारिन चीनी भाषा में फिल्में बनाई हैं.

उनकी फिल्म एड़पा काना (गोइंग होम) ने 2016 में सर्वश्रेष्ठ ऑडियोग्राफी (गैर-फीचर) के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता .2015 में केरल (IDSFK) की, फिल्म प्रभाग द्वारा आयोजित मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) में आईडीपीए पुरस्कार और अंतर्राष्ट्रीय डॉक्यूमेंट्री और लघु फिल्म समारोह में विशेष जूरी मेंशन जीता. फिल्म ने उसी वर्ष बीजिंग फिल्म अकादमी, चीन में आयोजित ISFVF की यात्रा की.

पहाड़ा और एड़पा काना उनकी दो फिल्में हैं जिन्हें क्रमशः भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के 44वें और 47वें संस्करण में भारतीय पैनोरमा (गैर-फीचर) के लिए चुना गया था. आदिवासी समाज में आदिवासी महिलाओं की दुर्दशा पर उनके संथाली वीडियो दीबी दुर्गा ने 2019 में बांग्लादेश और मलेशिया की यात्रा की.

नेटफ्लिक्स श्रृंखला, जामतारा, ने उन्हें जामताड़ा शेड्यूल के लिए लाइन प्रोड्यूसर के रूप में रखा था. उन्होंने 2021-22 में प्रोडक्शन कंपनी ICE मीडिया लैब और एनालिटिक्स के साथ काम करते हुए डाबर, ITC और स्प्रिंगफिट जैसे ब्रांडों के लिए कई डिजिटल विज्ञापन फिल्मों का निर्देशन किया है.

Haftix Films के साथ उनके अंतर्राष्ट्रीय सह-निर्माण आमिर को 39वें बुसान इंटरनेशनल शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल, साउथ कोरिया, 2022 में “हब ऑफ एशिया” सेक्शन के लिए चुना गया था. उनके नवीनतम निर्देशन TEERE BENDHO NA.. (UNANCHORED) 14वें आईडीएसएफएफके, 2022 को प्रतियोगिता में चुना गया था. निरंजन ने सितंबर 2022 में एसआरएफटीआई के निर्देशन और पटकथा लेखन विभाग में सहायक प्रोफेसर (संविदात्मक) के रूप में सेवा भी पूरी कर ली है.

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