Skip to main content

झारखंड: सुरक्षा बलों की हिंसा और छेड़खानी के शिकार हुए आदिवासी, महासभा ने जारी की रिपोर्ट

Posted on December 3, 2022 - 1:39 pm by

पश्चिमी सिंहभूम के चिरियाबेड़ा गांव में 11 नवंबर को सुरक्षा बलों के द्वारा सर्च अभियान चलाया गया था, जिसमें सर्च अभियान के दौरान निर्दोष आदिवासियों के साथ सुरक्षा बलों ने हिंसा की थी. इस विषय को लेकर दो दिसंबर को झारखंड जनाधिकार महासभा के प्रतिनिधियों ने उपायुक्त व पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की थी. उस सर्च अभियान में पश्चिम सिंहभूम के रियाबेड़ा में आदिवासी फिर सुरक्षा बलों की हिंसा और छेड़खानी के शिकार हुए हैं. यह दावा झारखंड जनाधिकार महासभा की फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट में किया गया है.

रिपोर्ट शुक्रवार को पश्चिम सिंहभूम के डीसी और पुलिस अधीक्षक को सौंपी गयी. महासभा के प्रतिनिधिमंडल में जोहार, आदिवासी वीमेंस नेटवर्क, आदिवासी यंगस्टर यूनिटी, झारखंड किसान परिषद समेत कई संगठन के अंबिका यादव, एलिना होरो, कमल पूर्ति, मिली होरो, नारायण कांडेयांग, रमेश जेराई, रेयांस समाद, सोनल, सिराज आदि शामिल थे.

झारखंड जनाधिकार महासभा ने सरकार से मांग की है कि 11 नवंबर 2022 और 15 जून 2020 को चिरियाबेड़ा में हिंसा और छेड़खानी करने वाले सूरक्षा बल जवानों पर प्राथमिकी दर्ज कर कार्यवाई की जाए और पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए. इसके अलावा संदेह के आधार पर व माओवादियों को खाना खिलाने पर माओवादी घटना से न जोड़ा जाए. नक्सल अभियान के नाम पर निर्दोष आदिवासियों पर हिंसा व फर्जी मामला दर्ज न किया जाए. इसके अलावा पांचवी अनुसूची क्षेत्र में सर्च अभियान चलाने से पहले पारंपरिक ग्राम प्रधान की सहमति ली जाए और स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों को आदिवासी भाषा, रीति रिवाज, संस्कृति और उनके जीवन के बारें में प्रशिक्षित किया जाए और संवेदनशील बनाया जाए.

फैक्ट फाइडिंग के रिपोर्ट में कहा गया है

रिपोर्ट के अनुसार सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान गांव की कई महिलाओं समेत निर्दोष आदिवासियों की पिटाई की गयी. एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के उद्देश्य से छेड़खानी की गयी. घरों में रखे सामान को तहस-नहस किया गया. विधवा नोनी कुई जोजो के घर में सुरक्षा बल के जवान घुस आये. सभी सामान बिखेर दिये. घर के अंदर उनकी नाबालिग बेटी के हाथों को दो जवानों ने पकड़ लिया. तीसरा जवान उसके गुप्त अंगों को दबाने लगा. जवान उसे खींच कर झाड़ी की तरफ ले जाना चाहता था. लेकिन वह किसी तरह भाग कर मां से लिपट गयी. जवानों ने मां नोनी कुई को डंडे से बुरी तरह पीटा. फिर भी वह अपनी बेटी से लिपटी रही. पीड़िता ने महासभा की फैक्ट फाइडिंग टीम को बताया कि ये जवान उनके गलत काम करना चाहते थे.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “जवानों ने 16 वर्षीय बामिया बहंदा को पेड़ से उतारकर पीटा. जब उसकी मां कदमा बहंदा उसे बचाने गयी, तो उसे भी पीटा गया. मां के दोनों हाथों को जवानों ने पकड़ लिया और फिर कमर में लात व बंदूक के बट से मारते हुए उन्हें उनके घर तक ले गए. उनके खुले बाल को पकड़ कर खींचा और जोर सो घुमाया. सुरक्षा बलों ने कई लोगों के घरों में रखे सामान (धान, कपड़े, बर्तन आदि) एवं खलियान में रखे धान को तहस-नहस कर दिया. पूरी घटना के दौरान सुरक्षा बल के जवान हिंदी में पूछताछ कर रहे थे और ग्रामीण हो भाषा में बोल रहे थे, क्योंकि वे हिंदी भाषा समझ नहीं पा रहे थे.”

फैक्ट फाइडिंग ने  मीडिया रिपोर्ट का हवाला देकर कहा है, “यह कोबरा-209/205, झारखंड जगुआर, सीआरपीएफ की बटालियन व स्थानीय पुलिस का संयुक्त अभियान था. चिरियाबेड़ा, लोवाबेड़ा व हाथीबुरु में सर्च अभियान चला रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि इस दौरान जंगल में सीरीज बम पाए गये, जिन्हें डिफ्यूज किया गया. जंगल से भाकपा माओवादी का पोस्टर, बैनर समेत कई दैनिक इस्तेमाल का समान पाया गया.”

कहा गया कि 15 जून 2020 को भी सुरक्षा बल के जवानों ने सर्च अभियान के दौरान इसी गांव के आदिवासियों को डंडे, बैटन, राइफल के बट और बूटों से बेरहमी से पीटा था. पीड़ितों ने कई बार विभिन्न स्तर पर लिखित आवेदन दिया, लेकिन आज तक न दोषी सुरक्षा बलों के विरुद्ध कार्रवाई हुई और न ही पीड़ितों को मुआवजा मिला. न्यायालय में भी पीड़ितों का बयान दर्ज करवाने में जांच पदाधिकारी का रवैया नकारात्मक और उदासीन है.

रिपोर्ट में कहा गया है, “यह भी सोचने का विषय है कि चिरियाबेड़ा व अंजेड़बेड़ा में बुनियादी सुविधाओं व कल्याणकारी सेवाओं की स्थिति दयनीय है. चिरियाबेड़ा में कोई आंगनवाड़ी नहीं है. निकटतम आंगनवाड़ी गांव से 6 किमी दूर अंजेडबेड़ा में है, जिस कारण बच्चे आंगनवाड़ी सेवाओं से वंचित हैं. कई वृद्ध व विधवा महिलाएं पेंशन से वंचित हैं. शिकायत के बावजूद अंजेड़बेड़ा के आठ अत्यंत गरीब परिवार लगभग एक साल से राशन से वंचित हैं. स्थानीय रोजगार के अभाव में बड़े पैमाने पर गांव के युवा पलायन कर जाते हैं.”

वहीं अभियान के दौरान आदिवासियों के प्रति ऐसा अमानवीय व गैरकानूनी रवैया पूर्ण रूप से संविधान व लोकतंत्र विरोधी है. ग्रामीणों की विशेष परिस्थिति व समस्याओं को समझने के बजाय सुरक्षा बलों द्वारा संवैधानिक, कानूनी व मानवता की सीमाओं को लांघ कर अभियान के नाम पर निर्दोषों पर व्यापक हिंसा की जाती है.

यह भी देखने को मिल रहा है कि सारंडा क्षेत्र में ग्रामीणों के विरोध के बावजूद एवं बिना ग्राम सभा की सहमति के सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित किए जा रहे हैं. यह पांचवीं अनुसूची व पेसा कानून का स्पष्ट उल्लंघन है. क्षेत्र के निर्दोष आदिवासी-मूलवासी-वंचितों को माओवादी घटनाओं में फर्जी रूप से आरोपी बनाया जा रहा है. केंद्र सरकार का आदिवासी-विरोधी चेहरा तो स्पष्ट है. लेकिन यह दुःख की बात है कि इस मामले में हेमंत सोरेन सरकार का रवैया भी अत्यंत उदासीन है. लोगों का गुस्सा हेमंत सरकार के प्रति दिखा.

No Comments yet!

Your Email address will not be published.