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झारखंड: टाटा स्टील फाउंडेशन द्वारा संवाद का 9वें संस्करण का आयोजन

Posted on November 17, 2022 - 12:50 pm by

संवाद की यात्रा जनजातीय पहचान के विभिन्न लक्षणों का एक साथ आना और आदिवासी लोगों के लिए उनकी व्यक्तिगत यात्रा को चार्ट करना है जो इसके मूल में हैं. रिदम्स ऑफ़ द अर्थ संगीत का घटक है, हम सौभाग्यशाली हैं कि 52 प्रतिभागियों ने अपने संगीत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने में अपनी बुलाहट पाई है  और आज एल्बम का प्रदर्शन उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. उक्त बातें टाटा स्टील फाउंडेशन के सीईओ सौरव रॉय ने संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन कही.

संवाद कार्यक्रम का आयोजन जमशेदपुर स्थित गोपाल मैदान में की गई है.

क्या है संवाद कार्यक्रम

जमशेदपुर में जनजातीय पहचान पर प्रतिवर्ष एक हस्ताक्षर कार्यक्रम किया जाता है. जिसे संवाद कहते हैं. यह कार्यक्रम टाटा स्टील फाउंडेशन  के द्वारा आयोजित की जाती है. आदिवासी नायक भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि देने के साथ 15 नवंबर को इसकी शुरुआत की गई. इस वर्ष संवाद अपने 9वें संस्करण में है.  जो 15 से 19 नवंबर के बीच निर्धारित है.

बता दें कि संवाद अपनी तरह का पहला अखिल भारतीय आदिवासी सम्मेलन है. जिसके उद्घाटन समारोह में 501 नगाड़ों की गूँजती धुन और बहुत धूमधाम के बीच जावा का अनावरण देखा गया. महामारी के बाद दोबारा शुरू किए गए संवाद-2022 में 2000 से अधिक लोगों की मेजबानी की जा रही है. ये लोग 200 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिनमें 23 राज्यों सहित 4 केंद्र शासित प्रदेशों से कुल 27 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह शामिल हैं.

कई राज्यों के आदिवासी शामिल हुए

संवाद के दूसरे दिन यानी 16 नवंबर को गोपाल मैदान में आदिवासी संगीत के पहले एलबम का प्रदर्शन हुआ. भारत भर के आदिवासी समुदायों के 52 कलाकारों द्वारा 12 गीतों के संग्रह के रूप में क्यूरेट किया गया.  इस प्रस्तुति का गठन ‘स्वरथमा’ के सहयोग से किया गया था. इसके तहत केरल, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मणिपुर के आदिवासी समुदायों के मंत्रमुग्ध कर देने वाले सांस्कृतिक प्रदर्शन किये गए. टाटा स्टील फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक जनजातीय कॉन्क्लेव में शो को प्रभावित किया गया.

आकर्षण का केंद्र बना आदिवासियों की नृत्य शैली

दूसरे दिन के शाम को वायनाड जिले में केंद्रित केरल की पनिया जनजाति द्वारा खुशी के अवसरों के दौरान किए जाने वाले नृत्य वट्टक्कली की प्रदर्शनी के साथ शुरू की गई.

शाम को गोपाल मैदान में हिमाचल प्रदेश की बोध जनजाति का पिटी नृत्य अगला आकर्षण था. लोसर (बोध नव वर्ष), विवाह,  जन्म समारोह आदि के उनके उत्सव के हिस्से के रूप में आमतौर पर पिटी नृत्य किया जाता है.

ओडिशा की धुर्वा जनजाति द्वारा बिड़ली नृत्य के एक अन्य प्रदर्शन ने भी दर्शकों को आकर्षित किया. यह नृत्य आमतौर पर जनजाति द्वारा कटाई के बाद के मौसम में किया जाता है, जब उनके घर भोजन और खुशी से भर जाते हैं. छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति की उप-जाति दंडानी माड़िया ने गौर नृत्य किया. यह विवाह, त्योहारों और जात्राओं के दौरान प्रदर्शित किया जाता है

अगला आकर्षण मणिपुर की माराम नागा जनजाति का माराम युद्ध नृत्य था. यह विशेष युद्ध नृत्य आमतौर पर विजयी अवसरों के दौरान बहुत जोश और उल्लास के साथ किया जाता है. इन कई लुभावनी प्रस्तुतियों के बाद ‘समकालीन दुनिया में जनजातीय कला की प्रासंगिकता’ जैसे विषयों पर चर्चा की गई. साथ ही संवाद फैलोशिप प्रतिभागियों ने ‘सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में डिजिटल मीडिया के उपयोग को समझने’ पर चर्चा की.

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