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झारखण्ड: आदिवासी बहुल गांव में आदिवासी ही हो गांव का प्रधान: अर्जुन मुंडा

Posted on March 20, 2024 - 10:58 am by
झारखण्ड: आदिवासी बहुल गांव में आदिवासी ही हो गांव का प्रधान: अर्जुन मुंडा

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्य में सीएनटी एक्ट के उल्लंघन को लेकर गंभीरता जताते हुए झारखण्ड आदिवासी कल्याण आयुक्त को पत्र लिखा है. पत्र के माध्यम से केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री व कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा ने झारखंड के आदिवासी कल्याण आयुक्त को कर्तव्यों का बोध कराया है. इसके साथ ही आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान मिटाने की प्रवृत्तियों पर रोक लगाने की हिदायत भी दी है.

केंद्रीय मंत्री ने आदिवासी कल्याण आयुक्त को लिखे पत्र में कहा कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों की सामुदायिक और खेतिहर भूमि को हर तरह से संरक्षण देना है. किन्तु एक्ट की भावनाओं से अपरिचित राजस्व अधिकारी संरक्षण की मूल भावना का लगातार उल्लंघन कर रहे हैं.

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के तहत अनुक्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजाति के प्रशासन एवं नियंत्रण पर पांचवीं अनुसूची के प्रावधान लागू होते हैं. इसके तहत अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों की भाषा-संस्कृति, जीवनशैली, उनकी पारंपरिक रूढ़िवादी व्यवस्था एवं ग्रामसभा के अधिकारों के संरक्षक राज्यपाल होते हैं और उनके अनुरूप निर्णय लिया जाना आवश्यक है.

उन्होंने अनुच्छेद 164 (1) का उल्लेख करते हुए बताया की इसमें विशेष रूप से उपबंधित किया गया है कि झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों में जनजातियों के कल्याण का भारसाधक एक मंत्री होगा. साथ ही जनजातीय कल्याण आयुक्त का पद भी अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों की इन सभी कठिनाइयों के समाधान के लिए सृजित किया गया है.

केंद्रीय मंत्री ने आगे लिखा कि आदिवासी गांव में किसी गैर-आदिवासी को प्रधान बना देना पेसा एक्ट के नियमों का उल्लंघन है. आदिवासी बहुल गांव में किसी आदिवासी को ही गांव का प्रधान होना चाहिए. उक्त विषय के सम्बन्ध में उन्होंने पूर्वी सिंहभूम जिला में पटमदा प्रखंड के मौजा लावा गांव का उदहारण देते हुए लिखा.

केंद्रीय मंत्री ने पूर्वी सिंहभूम जिला में पटमदा प्रखंड के मौजा लावा का उदहारण देते हुए लिखा कि यह खेदजनक है कि लावा मौजा में खाता 308, प्लॉट 1939, 1940. रकवा 11.39 एकड़ मुंडा समाज की श्मशान भूमि रही है. जहां आदिवासी समाज सैंकड़ों वर्षों से हड़गड़ी का अनुष्ठान करते रहे हैं. सर्वे सेटलमेंट 1932 में वह श्मशान दर्ज था.

जिसे 1964 के रिविजनल सर्वे सेटलमेंट के बाद बने खतियान में अनावाद दर्शाकर भूमि की प्रकृति ही बदल दी गई। जो सीएनटी की मूल भावना का स्पष्ट उल्लंघन है. उन्होंने संबंधित प्रशासनिक पदाधिकारियों को उक्त भूमि को पुनः भूमिज मुंडा की श्मशान भूमि के रूप में खतियान में दर्ज करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही.

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