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झारखंड: जानिए क्यों एक बार फिर से चर्चा में है खतियान और आरक्षण का मुद्दा

Posted on November 7, 2022 - 1:09 pm by

विजय उरांव, ट्राईबल खबर के लिए

झारखंड में फिर एक बार 1932 का खतियान चर्चा में है. हेमंत सोरेन सरकार ने राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के मंडरा रहे खतरे के बीच 14 सितंबर को हेमंत कैबिनट ने 1932 खतियान राज्य में लागू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. झारखंड में स्थानीय नीति की परिभाषा प्रस्ताव विधेयक 2022 के अनुसार 1932 के पहले के पुर्वजों को झारखंड का स्थानीय निवासी माना जाएगा. इसके साथ ही अन्य पिछड़े वर्गों को मौजूदा 14 फीसद के बजाए 27 फीसद आरक्षण देने का फैसला किया है. साथ ही एससी व एसटी कोटे में भी दो-दो फीसद आरक्षण बढ़ायी जाएगी. झारखंड विधानसभा में हेमंत सोरेन सरकार 11 नवंबर को 1932 खतियान और आरक्षण के मुद्दे को लाने वाली है.  

अपने फैसले को लेकर वर्तमान में हेमंत सोरेन राजनीतिक रूप से एक मजबूत चेहरा बनकर उभरे हैं. अपने वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए सभी तरह के फैसले ले रहे हैं. चाहे वह पंचायत सचिव का मामला हो. पुरानी पेंशन योजना हो, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका चयन एवं मानदेय 2022 हो या सहायक पुलिस से जुड़ा मामला हो या फिर अनुसूचित क्षेत्र में 13 जिलों के नवनियुक्त माध्यमिक शिक्षक 2019 बैच का मामले हो, सभी को निपटाते जा रहे हैं. लोगों का मानना है कि यह हेमंत सोरेन वह नहीं रहे जिसे हम 2012-13 के समय में देख रहे थे.

1932 के खतियान के मुद्दे को लेकर “हेमंत सोरेन आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं” के नारे के साथ सचिवालय में सीएम हेमंत सोरेन को फूल मालाओं से लाद दिया गया था. इस तरह का उत्सव दर्शाता है कि वर्तमान समय में अगर चुनाव हो तो झारखंड में कोई भी विपक्ष हेमंत सोरेन के सामने टिक नही पाएगा. भारतीय जनता पार्टी के कई कार्यकर्ता भी 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति के प्रस्ताव को लाना सही फैसला मानते है. अपने वर्तमान फैसले को लेकर 2024 में भी अगर हेमंत सोरेन अपने कार्यों को लोगों के बीच भुना पाते है तो पुन: उनकी सरकार आने से कोई भी ताकत रोक नही पाएगी.

1932 के खतियान से कहां जाएंगे कोल्हान वासी

कैबिनट में प्रस्ताव पास होने पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने 1932 के मामले को लेकर कहा था कि “अगर 1932 का खतियान लागू हो गया तो प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से कोल्हान क्षेत्र के 45 लाख लोग सरकारी योजनाओं से वंचित हो जाएंगे. उन्हें स्थानीयता का प्रमाण पत्र नही मिलेगा. इसके अलावा सरकारी व गैर सरकारी किसी भी प्रकार की नौकरी नही मिलेगी. इसलिए सरकार को लास्ट सर्वें सेटलमेंट के आधार स्थानीय नीति बनानी चाहिए. 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति के विरोध में आंदोलन किया जाएगा.”

वहीं पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव का कहना था कि 1932 को स्थानीय नीति का कट ऑफ डेट बनाए जाने का निर्णय कहीं उसके बाद हुए सर्वें सेटलमेंट (1964-65 तक) वालों को वंचित तो नही कर देगा, लोग भयभीत हैं. इसके अलावा उन्होंने खतियान आधारित नियोजन नीति, भाषा नीति, उद्योग नीति, विस्थापन नीति पर भी ध्यान दिलाया है.

इसके अलावा सिंहभूम से लोकसभा सांसद गीता कोड़ा ने हेमंत सोरेन से 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति पर किए गए प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की मांग की थी तथा अंतिम सर्वे सेटलमेंट को स्थानीयता का आधार बनाए जाने की बात कही थी. क्योंकि कोल्हान में अपनी ही जन्मभूमि में इस क्षेत्र की जनता प्रवासी बनकर रह जाएगी. कोल्हान में सर्वें सेटलमेंट 1964, 65 और 70 में किया गया था. ऐसी स्थिति में 1932 का खतियान आधारित स्थानीय नीति सही नही है.

झारखंड बनने के बाद से ही बड़ा मुद्दा रहा है स्थानीयता

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने राज्य में 1932 आधारित डोमिसाइल नीति लागू की थी, लेकिन विरोध के बाद मामला हाईकोर्ट में पहुंचा और कई प्रावधान पर आपत्ति के बाद फिर से परिभाषित करने का निर्देश दिया.

2011 में पुर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने स्थानीय नीति बनाने के लिए कमिटी बनाई थी. तब इस कमेटी में तत्कालिन उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो व हेमंत सोरेन शामिल थे. यह कमेटी किसी निष्कर्ष तक नही पहुंच सकी थी. कई सर्वदलीय बैठक में भी एक बिंदु पर कोई राजनीतिक दल नहीं पहुंच सके. 2016 में रघुवर दास की सरकार ने 30 वर्षों से रह रहे झारखंड के लोगों को स्थानीय माना.

वर्तमान में हेमंत सोरेन ने 1932 खतियान और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसद आरक्षण देने के मुद्दे पर बड़ा दांव खेला है. झारखंडी पहचान को लेकर झामुमो हमेशा से मुखर रही है. अपने चुनावी घोषणा में भी स्थानीय के लिए 1932 खतियान का जिक्र किया था. इस पूरे मामले में झामुमो ने भाजपा को घेरे में लिया है. झामुमो के लिए आदिवासी-मुलवासी वोट बैंक रहा है. हाल में ही 1932 के खतियान को लेकर आंदोलन हुआ था. इसमें लोबिन हेंब्रम लगातार मुखर रहे थे और अपने सरकार को कटघरे में खड़ा किया था. हेमंत सोरेन इस मुद्दे के साथ अपने वोटबैंक को भी चुप कराने में कामयाब रहे हैं.

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