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झारखंड: सबकी जमीन बचाने की लड़ाई जीती, अपनी लड़ाई हार गई– दयामनी बारला

Posted on December 26, 2022 - 3:44 pm by

विजय उरांव

“मन मानने को तैयार ही नहीं हो रहा है की मैं अपने आशियाना को टूटने से बचा नहीं पाई. सभी सामाजिक लड़ाई जीतते रही, सबका जमीन, घर-द्वार बचाने में कामयाब रहीं, लेकिन मेरा आर्थिक रीढ़, मेरी चाय की दूकान की 3 फिट जमीन को बचाने में बिफल रही.” ये बातें सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखी हैं.

दयामनी कहती हैं “वर्ष 1996 से सामाजिक न्याय की संघर्ष के रास्ते चलते हुए रोजी रोजगार के लिए रांची के क्लब रोड़ में चाय नाश्ता की दुकान शुरु की. चाय दुकान चलाते हुए बहुत से उतार-चढ़ाव देखा. चाय दुकान के साथ हमारा सफर 25 वर्ष पूरा हुआ. इन 25 वर्षो में सामाजिक न्याय के संघर्ष के यही मेरा आर्थिक आधार था. हमारे साथ समाज को जिंदगी यहीं से मिली.”

क्या है पूरा मामला

क्रिसमस के दिन यानि की 25 दिसंबर को सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला की क्लब रोड स्थित दूकान (झारखंड होटल) का किचन वाला हिस्सा तोड़ दिया गया. उस दूकान पर करीब दस लोग काम करते थे.

ट्राईबल खबर से फोन पर हुई बातचीन में सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला कहती है कि मैं चीजों को समझने की कोशिश कर रही हूं, उसके किचन को तोड़ दिया गया है. वहां पर स्थित उनका ही घर तोड़ा गया. नोटिस दिए जाने के सवाल पर कहती हैं कि उनका किचन तोड़ने से पहले उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया था. जिसके बाद उन्होने अपने साथ काम करने वाले दस लोगों को घर भेज दिया है.

आगे बताती हैं कि क्लब रोड में स्थित उस जमीन पर आर्मी और चर्च दोनों ही दावा करते हैं जबकि वह जमीन दयामनी ने चर्च से लिया था. किसी तरह की साजिस के सवाल पर कहती है कि वह चीजों को समझने की कोशिश कर रही है. पूरा मामला क्या है समझने के बाद वह आगे कुछ कह सकती है.

सब लड़ी मैने जीता अपनी हार गई

वे कहती है, “आज मन उदास है,  आगे नगर निगम पीछे सरकार. जीईल मिशन चर्च ने उन्हे 9/15 फिट की जमीन मेरे पति के नाम लीज में दी थी. इसके पीछे करीब 4 फिट जमीन पर दूकान का किचन था. आज इस किचन को सरकार हटाने के लिए मजबूर कर दिया. छत टूटा …मेरा मन टूटा. सब लड़ाई मैने जीता, अपनी लड़ाई हार गई. मेरे साथ सीधे तौर पर 10 परिवार बेरोजगार होगा. बाकी मेरे पास शब्द नही.”

पुराने दिनो को याद करते हुए कहती है, “वो दिन ताजा होता जा रहा है जब मेरे परिवार के हाथ से जमीन तकतवारों ने छीना था, जमीन वापसी का केस लड़ते मेरा परिवार कंगाल हो गया था. तब गांव से पलायन कर रांची पहुंचे थे. आगे और क्या होने वाला है. अब तो मन पत्थर हो चूका है”

बता दें कि सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला झारखंड में आदिवासी जमीन और उनके हितों की रक्षा के प्रति आंदोलनरत रही हैं. आदिवासी जमीनों के हस्थांतरण से लेकर नेतरहाट फायरिंग रेज के खिलाफ आंदोलन तक उनकी भागीदारी देखने को मिली है. वे खूंटी से लोकसभा और खूंटी से विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं.

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