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लोकसभा चुनाव को लेकर झामुमो का शुरू हुआ आदिवासी गावों में ‘कुल्हि दुरूपह’

Posted on March 19, 2024 - 6:19 pm by
लोकसभा चुनाव को लेकर झामुमो का शुरू हुआ आदिवासी गावों में 'कुल्हि दुरूपह'

लोकसभा चुनाव को देखते हुए सभी पार्टियां अपने अपने तरीके से अपना चुनाव प्रचार कर रही हैं. वहीं झारखण्ड के संथाल परगना के गांवों में ‘कुल्हि दुरूपह’ चल रहा है. इन दिनों झारखंड मुक्ति मोर्चा ( झामुमो) दिन-रात ‘कुल्हि दुरूपह’ करने में जुटा है. आखिर क्या है ‘कुल्हि दुरूपह’. कुल्हि का मतलब गली या टोला और दुरूपह का मतलब बैठना है, यानी गांव के मध्य में शाम को ग्रामीणों के साथ बैठक या छोटी सभा करना.

झामुमो अलग- अलग जगहों पर ‘कुल्हि दुरूपह’ कर रहा है. दुमका लोकसभा क्षेत्र के 1899 बूथों में से झामुमो ने अबतक लगभग 900 से ज्यादा बूथों पर कुल्हि दुरूपह कर चुकी है. बाकी बचे बूथों पर भी पार्टी लगातार कड़ी मेहनत कर रही है. बिना किसी प्रचार और शोरगुल के झामुमो अंदर ही अंदर भाजपा के बूथ मैनेजमेंट को मात देने में झामुमो जुटी हुई है.

संथाल परगना के आदिवासी गांव में परंपरागत तरीके से किसी विशेष बात को गांव के प्रत्येक व्यक्ति को बताने के लिए कुल्हि दुरूपह करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. इसी परंपरा को आत्मसात कर झामुमो राजनीति के मैदान में बाजी मारता रहा है. हर चुनाव में कुल्हि दुरूपह के जरिए ही झामुमो गांव के हर वोटरों तक अपनी पहुंच बना पाता है और पार्टी सुप्रीमो शिबू सोरेन के संदेश को पहुंचाता है.

खबरों के अनुसार पार्टी कार्यकर्ता एक विधानसभा क्षेत्र में करीब 15 से 18 कुल्हि दुरूपह प्रतिदिन आयोजित कर रहे हैं. पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर हेमंत सोरेन को भाजपा द्वारा झूठे केस में फंसाकर जेल भेजने की बात कह भाजपा को हराने की अपील कर रहे है. झामुमो कुल्हि दुरूपह में केंद्र सरकार के खिलाफ आदिवासी समुदाय को यह बताने की कोशिश हो रही है कि अगर आप लोग गोलबंद होकर भाजपा प्रत्याशी को नहीं हराते हैं तो आने वाले समय में आदिवासियों अस्तित्व खत्म हो जायेगा.

कैसे काम कर रही है पार्टियां

‘कुल्हि दुरूपह’ के लिए पहले पार्टी के हार्डकोर कार्यकर्ता गांव या टोला के सभी ग्रामीणों को जानकारी देते हैं कि किस दिन शाम में गांव के सभी लोगों को निर्धारित स्थान पर जमा होना है. गांव व टोला के सभी ग्रामीण जमा होते हैं और पार्टी के पंचायत स्तरीय नेता गुरुजी शिबू सोरेन/चम्पाई या हेमंत सोरेन का संदेश बताते हैं. यह बैठक देर रात तक चलती है. इस बैठक में ग्राम पंचायत के सदस्य के अलावा आदिवासी ग्रामीण मौजूद रहते हैं.

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