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केरल: भारतीय इतिहास में आदिवासी योद्धाओं के योगदान को शामिल करें

Posted on December 16, 2022 - 5:52 pm by

स्वतंत्रता संग्राम में वायनाड के आदिवासी समुदायों द्वारा निभाई गई भूमिका का उल्लेख भारतीय इतिहास की पुस्तकों में अभी तक नहीं किया गया है. बिहार और झारखंड में क्रमशः संथाल और मुंडा आदिवासी संघर्षों और 1857 के विद्रोह से आधी सदी से भी पहले, कुरिचिया और कुरुमा आदिवासी योद्धाओं द्वारा वायनाड के जंगलों में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ वीरतापूर्ण संघर्ष भारतीय इतिहास के शुरुआती संघर्ष थे. कालीकट विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ. के.एस. माधवन ने कही.

केरल के वायनाड जिले के पुलपल्ली में राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आदिवासी योद्धाओं के योगदान को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर दिया गया. इस दो दिवसीय कार्यक्रम ने विश्वविद्यालयों के भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रम में उल्लेख किए जाने की बात कही है.

बता दें कि इस संगोष्ठी का आयोजन पजहस्सीराजा कॉलेज के इतिहास विभाग द्वारा इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च के सहयोग से किया गया था.

कुरिचिया नेताओं ने अंग्रेजों के अस्तित्व को खतरें में डाल दिया था

डॉ माधवन ने कहा,”आदिवासी नेताओं जैसे थलक्कल चंदू और रमन नम्बी के योगदान को याद करते हुए, इन कुरिचिया नेताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी समुदाय को लामबंद किया. जिसने वास्तव में अंग्रेजों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था.” इसी के तहत सेमिनार में 10 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए.

डॉ. माधवन ने आगे कहा,”सन 1797 से 1812 तक वायनाड में जनजातीय आंदोलनों ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसे राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे के माध्यम से केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.

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