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प्रेरणा:  केरल की पहली आदिवासी आइएएस श्रीधन्या सुरेश

Posted on October 19, 2022 - 4:47 pm by

नेहा बेदिया

अपनी कड़ी मेहनत, लगन, संकल्प और कुछ कर दिखाने की दृढ़ निष्ठा को लेकर, 2018 में आइएएस बनने के सपने को साकार कर श्रीधन्या ने इतिहास रचा. वह केरल की पहली आदिवासी आइएएस बनीं. इसके लिए उन्होंने कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए,  खुद के हौसले और जज्बे को कायम रख कर लगातार कार्य करती रही. श्रीधन्या ने अपनी आइएएस बनने की परिश्रम और सफलता के द्वारा ही पूरा किया है. उनका आइएएस बनने का यह सफर काफी प्रेरणादायक है.

सुरेश केरल राज्य के वायनाड जिले के छोटे गांव पोजुथाना की रहने वाली हैं, जो सबसे पिछड़ा क्षेत्र है. सुरेश कुरिचिया आदिवासी समुदाय से हैं. परिवार में माता-पिता के अलावे तीन भाई-बहन हैं. परिवार की आर्थिक स्थिती बेहद लाचार होने के बावजूद श्रीधन्या ने चुनौतियों का डटकर सामना किया. उन्हें मालूम था कि यदि इस दयनीय हालात से उबरना है तो कुछ बड़ा हासिल करना होगा. इसके लिए श्रीधन्या ने अपनी पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी.

पिता तीर-धनुष बेचते थे और मनरेगा में काम करती थी

श्रीधन्या के हौसलों को पंख मिल सके,  इसके लिए पिता ने हर मुमकिन प्रयास किया. पिता दिहाड़ी मजदूरी के साथ-साथ पास के निजी बाजार में तीर-धनुष भी बेचने का काम करते थे. मां मनरेगा के तहत काम करती थी. परिवार की स्थिती ऐसी थी कि दो वक्त की रोटी के लिए भी सोचना पड़ता था. इन सब परेशानियों के होते हुए परिवार ने श्रीधन्या की पढ़ाई के लिए पैसों की कमी नहीं होने दिया.

श्रीधन्या ने अपनी शुरुआती पढ़ाई सरकारी विद्यालय से की. इसके बाद कालीकट विश्वविद्यालय से एप्लाइड जूलॉजी में परास्नातक की डिग्री हासिल की. परास्नातक की शिक्षा के उपरांत अनुसूचित जनजाति विकास विभाग में क्लर्क के पद पर कार्यरत रहीं. उन्होंने वायनाड के एक आदिवासी हॉस्टल में वार्डन का भी पद संभाला है.

कॉलेज के समय से ही श्रीधन्या को प्रशासनिक सेवा क्षेत्रों में रुचि थी. लेकिन उस समय मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं था. जब वे हॉस्टल में वार्डन का काम कर रहीं थीं, तब उनकी मुलाकात आईएएस श्रीराम सांबा शिवराव से हुई. आइएएस श्रीराम ने ही उन्हें सिविल सेवा में भाग लेने को प्ररित किया और विशेष जानकारियां दी. यहीं से उनका दिशानिर्देश हुआ और वो आइएएस का सपना लिए कार्य करने लगीं.

असफलता से हारी नहीं, प्रेरणा ली

श्रीधन्या ने साल 2016 में पहला यूपीएससी परीक्षा दी और असफल रहीं. उन्होंने पहली अलफलता से प्रेरणा लेकर दोबारा 2017 में इसका परीक्षा दिया. हांलाकि वो इसमें भी असफल रहीं. लेकिन उनकी आइएएस बनने की जिज्ञासा और संकल्प ने कभी उसके संघर्ष और मनोबल को टूटने नहीं दिया. लिहाजा उन्होंने 2018 में यूपीएससी की परीक्षा पास कर 410वां रैंक हासिल किया.

परेशानी अभी खत्म नहीं हुई थी क्योंकि उन्हें परीक्षा का अंतिम चरण यानी इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाना था. इसमें परेशानी यह थी कि उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था. पैसों के कमी की वजह सफलता के आड़े आ रही थी. लेकिन उनके विश्वसनीय दोस्तों ने इस समस्या का निदारन किया. सब ने चंदा एकत्रित कर 40 हजार रुपये श्रीधन्या को दिया. ताकि वो अपना आइएएस बनने का सपना साकार कर सके.

अपने परिवार और दोस्तों के उम्मीदों पर श्रीधन्या खरा उतरीं. वह इंटरव्यू को पार कर बतौर आइएएस ऑफिसर श्रीधन्या सुरेश बनीं और क्षेत्र का नाम रोशन कर कई लोगों के लिए प्रेरणा का पात्र बनीं.

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