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जानिए भारत के आकर्षक आदिवासी लोकनृत्य के बारें में

Posted on November 7, 2022 - 5:47 pm by

नेहा बेदिया,  ट्राइबल खबर के लिए

भारत में 705 से अधिक जनजातियां हैं. जिनके सामूहिक वेश-भूषा, रहन-सहन, संस्कृति, परंपरा आदि में कई अलग प्रकार दिखाई देते हैं. लेकिन इन सब के बावजूद अगर कुछ सामान्य है, तो वह प्रकृति के प्रति उनका जुड़ाव है. प्रकृति को समर्पित इन जनजातियों का मूल ही सबको जोड़े रखता है. इसी मूल को आदिवासी लोकनृत्य बड़े ही आकर्षक अंदाज में दर्शाते हैं.

देश के राज्यों से विभिन्न जनजातियों के लोकनृत्य को यदि पहली बार देखें तो शायद कोई समानता देखने को नहीं मिले. ये इसलिए है क्योंकि उनके पहनावे और नृत्य करने के तरीके अलग नजर आते हैं. लेकिन जब गौर करने लगते हैं,  तो कई सामान्य गुत्थियां सामने आने लगते हैं. जैसे- पहनावे में प्राकृतिक चीजें इस्तमाल करना,  नृत्य करने के दौरान गोल आकृतियां बनाना,  एक जैसे दिखने वाले वाद्य यंत्र उपयोग करना,  अपने नृत्य में मुख्यता फसल कटाई-बुनाई,  शादी-ब्याह,  शिकार आदि गतिविधियों की नकल करना शामिल है.

ऐसे ही कुछ प्रचलित आदिवासी लोकनृत्य, देश के कई राज्यों में किए जाते हैं जो बेहद आकर्षक व मन को मोह लेने वाले होते हैं. ये नृत्य अक्सर आदिवासी क्षेत्रों में शादियों, सालगिरहों, त्योहारों आदि सामूहिक समारोह में किए जाते हैं.

जानते हैं इन्हीं आदिवासी लोकनृत्य के बारे में –

संथाल नृत्य

संथाल नृत्य को भारत के सर्वश्रेष्ठ आदिवासी लोक नृत्यों में से एक माना जाता है. यह नृत्य अत्यधिक जीवंतता और उत्साह प्रदान करता है. इसे झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल व मध्य प्रदेश के लोक नृत्य की प्रतिकृति माना जाता है. संथाल नृत्य आमतौर पर संथाली जनजाति के पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा किया जाता है. सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक संथालों द्वारा प्रचलित,  यह आकर्षक नृत्य रूप आदिवासी संस्कृति और परंपरा का एक शानदार प्रदर्शन है. जनजाति के इतिहास को गीतों,  लोकगीतों और नृत्यों में संरक्षित और पारित किया जाता है.

संताल नृत्य
  • चेराव लोकनृत्य

चेराव या बांस नृत्य मिजोरम का पारंपरिक नृत्य है. इसे मिजोरम के सबसे पुराने नृत्यों में से एक माना जाता है. कहा जाता है कि यह नृत्य एक अनुष्ठान से निकला है. इस नृत्य शैली में बांस को जमीन पर क्षैतिज या क्रॉस फॉर्मेशन में रखा जाता है. इन बांस के गतिविधियों की जोड़ी छह से आठ लोगों द्वारा धारण की जाती है. पुरुष नर्तक इन बाँस को एक लयबद्ध ताल पर ले जाते हैं जबकि महिलाएं नर्तकियाँ बाँस की संरचनाओं से अंदर और बाहर कदम रखते हुए इनायत से चलती हैं. पुरुषों द्वारा एक विशिष्ट ताल के लिए बांस को एक साथ टकराए जाते हैं.

चेराव लोकनृत्य
  • कालबेलिया लोकनृत्य

कालबेलिया नृत्य राजस्थान का लोक नृत्य है जो कालबेलिया संस्कृति का अभिन्न अंग है. इस नृत्य को सपेरा नृत्य के रूप में भी जाना जाता है. क्योंकि कालबेलिया को पारंपरिक सपेरा के रूप में जाना जाता है. यह खानाबदोश जनजाति सांप के जहर का व्यापार करने के लिए जगह-जगह यात्रा करती थी. यह आम तौर पर किसी भी खुशी के उत्सव के लिए किया जाता है और इसे कालबेलिया संस्कृति का एक अभिन्न अंग माना जाता है. कालबेलिया नृत्य का एक और अनूठा पहलू यह है कि यह केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है जबकि पुरुष वाद्य यंत्र बजाते हैं और संगीत प्रदान करते हैं.

कालबेलिया लोकनृत्य
  • छऊ नृत्य

छऊ एक अर्ध शास्त्रीय भारतीय नृत्य है जिसमें मार्शल, आदिवासी और लोक परंपराएं शामिल हैं. इसकी उत्पत्ति पूर्वी भारत में हुई है. यह तीन शैलियों में पाया जाता है,  अर्थात् बंगाल का पुरुलिया छऊ,  झारखंड का सरायकेला छऊ और ओडिशा का मयूरभंज छऊ.

इस नृत्य की वसंत उत्सव चैत्र पर्व के उत्सव में एक महत्वपूर्ण भूमिका है,  जो इसके अनुष्ठानों से सहज रूप से जुड़ा हुआ है. यह लोगों की कला है क्योंकि इसमें पूरा समुदाय शामिल होता है. यह पारंपरिक कलाकारों के परिवारों के पुरुष नर्तकियों द्वारा या गुरुओं के अधीन प्रशिक्षित लोगों द्वारा किया जाता है.

छऊ नृत्य
  • धीमसा लोकनृत्य

कोम्मू कोया नृत्य की तरह धीमसा नृत्य भी पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए है. यह मुख्यता आंध्रप्रदेश राज्य के विशाखापट्टनम जिले के पहाड़ी इलाकों ( जैसे अराकू घाटी) में की जाती है. यहां रहने वाले पोर्जा, वाल्मीकि,  बोगटा,  खोंड और कोटिया जनजाति द्वारा देवी-देवताओं के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए की जाती है. इसके अलावा इस नृत्य को आम तौर पर शादियों, शालगिरहों तथा प्रतिवर्ष होने वाले त्योहारों में भी किया जाता है. यह नृत्य पड़ोसी गांवों के बीच दोस्ती स्थापित करने के लिए किया जाता है. धीमसा नृत्य एक दूसरे की बाहों को एक दूसरे की पीठ पर बंद करके एक घेरे में किया जाता है. यह नृत्य मुख्य रूप से हाथों और पैरों की गति है.

धीमसा नृत्य
  • भगोरिया लोक नृत्य

भगोरिया लोक नृत्य मुख्यता राजस्थान, मध्यप्रदेश के भील जनजाति द्वारा किया जाता है. यह भीलों का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है. बता दें कि फाल्गुन मास में भगोरिया उत्सव के कारण इसे ‘भगोरिया नृत्य’ नाम दिया गया है. राजस्थान व मध्य प्रदेश के कई आदिवासी क्षेत्रों में यह नृत्य बड़ी धूमधाम से किया जाता है. यह नृत्य भारत के प्रमुख त्योहार होली के अवसर पर किया जाता है. इस पर्व में अविवाहित युवक-युवती. महिलाओं को अपना पसंदीदा जीवन साथी चुनने का मौका मिलता है.

भगोरिया नृत्य

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