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उन आदिवासियों के बारें जानिए, जो पत्थर पिघलाकर बनाते हैं लोहा

Posted on January 23, 2023 - 4:51 pm by

नेहा बेदिया, ट्राइबल खबर के लिए

आपने पत्थर को छू देने से सोना बनने की कहानी तो सुनी ही होगी. अगर ऐसा है तो आपको यह भी पता होगा कि इस कहानी में एक वरदान होता है, जिससे किसी को भी छूने मात्र से सोना बनाया जा सकता है. ऐसा ही कुछ अगरिया जनजाति सदियों से करते आ रहे हैं. बस फर्क सिर्फ इतना है कि पत्थर को सोने में ना बदल कर लोहे में बदला जाता है. और ऐसा करने के लिए उन्हें कोई चमत्कार या अलौकिक शक्तियों का वरदान नहीं प्राप्त है. बल्कि अगरिया जनजाति के लोग सदियों पुरानी एक पारंपरिक तकनीक के माध्यम से पत्थर को लोहे में तब्दील करते हैं.

पत्थर को लोहे में बदलने के इस अनोखी व पुरानी तरकीब के वजह से मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले का एक आदिवासी परिवार प्रकाश में आया है. इस परिवार ने मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के परिसर में आयोजित होने वाले इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल 2023 में हिस्सा लेने का फैसला लिया है. इस फेस्टिवल में परिवार अपने कौशल का प्रदर्शन करेगा. यहां पहुंचने के लिए परिवार के 7 सदस्यों ने 460 किमी की दूरी तय की है. यह विज्ञान महोत्सव 21 जनवरी से शुरू हुआ था, जो 24 जनवरी तक रहेगा.

कौन हैं अगरिया आदिवासी समुदाय

अगरिया आदिवासियों के द्वारा लोहा बनाने के पारंपरिक तकनीक और तरीके के बारे में बात करने से पहले आइए जानते हैं कि अगरिया जनजाति कौन हैं और लोहे से उनका क्या संबंध है?

अगरिया मुख्य रूप से मध्य प्रदेश की जनजाति है, जो राज्य के डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, शहडोल, सिंगरौली, उमरिया, अनूपपुर और सीधी जिलों में रहते हैं. यह जनजाति उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के ज़िलों में भी रहते हैं. अगरिया लोगों का प्रमुख देवता ‘लोहासुर’ है, जिसका निवास धधकती हुई भट्टियों में माना जाता है. लोहासुर देवता के प्रति इसी आस्था के कारण अगरिया का गहरा संबंध लोहे से जुड़ता है.

प्राचीन काल में जिस तरह असुर, कोलों के क्षेत्रों में लुहार के समान कार्य करते रहे हैं, उसी प्रकार अगरिया गोंडों के क्षेत्र के आदिवासी लुहार हैं. ऐसा माना जाता है कि असुरों और अगरियों, दोनों को ही आर्यों के आने से पूर्व ही लोहा गलाने का राज स्वतंत्र रूप से प्राप्त था.

बता दें कि अगरिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय हमेशा से ही लौह अयस्क से लौह धातू का निर्माण करना रहा है. इसमें एक खास बात भी है कि लोहे को गलाने के लिए अयस्क में 49 से 56 प्रतिशत धातु होना अपेक्षित माना जाता है, लेकिन अगरिया इससे कम प्रतिशत वाली धातु का प्रयोग करते रहे हैं.

पत्थर कैसे बनता है लोहा

अगरिया जनजाति के सदस्य मोती सिंह मरावी बताते हैं कि वे जो लोहा बनाते हैं, वह जंग मुक्त होता है. पत्थर को लोहे में बदलने के लिए वे एक मिट्टी की भट्टी तैयार करते हैं जिसमें वे कोयले के साथ पत्थरों को डालते हैं. इस पत्थर को यह लोग कलेजी पत्थर कहते हैं.

इसके बाद वे भट्टी में आग लगाते हैं और एक धौंकनी के माध्यम से भट्ठी में हवा पंप करते हैं. यह धौंकनी वे अपने पैरों से चलाते हैं. यह प्रक्रिया चार घंटे तक चलती है. 7 किलो पत्थर से लगभग 200 ग्राम लोहा मिलता है. मरावी बताते हैं कि इस प्रक्रिया में लगभग 21 किलो लकड़ी के कोयले का उपयोग किया जाता है. और इस व्यवसाय के लिए वे जंगलों से कच्चा माल हासिल करते हैं.

मरावी कहते हैं कि इस प्रक्रिया के माध्यम से निकलने वाला लोहा, पत्थरों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है. इस लोहे का उपयोग कुल्हाड़ी, दरांती, हल, छेनी, हथौड़ा और चिमटा जैसे विभिन्न पारंपरिक उपकरणों को बनाने के लिए किया जाता है.

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