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महाराष्ट्र: ‘सेवा जोहार’अर्थात् प्रकृति मां की सेवा आदिवासियों के जीवन का सार

Posted on January 5, 2023 - 11:11 am by

गैर-इमारती वन उत्पाद जैसे गोंद के पौधे, तिलहन, फूल, औषधीय पौधे और खाद्य उत्पाद जैसे महुआ, जामुन, आम, इमली और आंवला आदि ने आदिवासी परिवारों में सबसे अधिक आय रूप में योगदान दिया है. इन संसाधनों तक पहुंच होने महाराष्ट्र के पिछड़े गढ़चिरौली जिले में आदिवासी महिलाओं की वित्तीय आत्मनिर्भरता को मजबूत किया है. गढ़चिरौली जिले में महिलाओं के संदर्भ में जनजातीय आबादी का उत्थान विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए गवर्नमेंट साइंस कॉलेज, गढ़चिरौली की प्रिंसिपल डॉ. हेमलता जे. वानखेड़े चौधरी ने कहा. 

वे 108वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान जनजातीय विज्ञान कांग्रेस में बोल रही थीं. मलेरिया और एलिफेंटियासिस, शहरी भारत में लगभग जिन बीमारियों का इलाज नहीं किया गया है.  वे अभी भी वन में रहने वाले आदिवासियों के लिए प्रमुख स्वास्थ्य जोखिम हैं.

उन्होने आगे कहा, “अब आदिवासियों को अपने जीवन के फैसलों और पारिवारिक मुद्दों पर नियंत्रण करने के लिए सशक्त बनाना, कुपोषण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर और गरीबी जैसे आदिवासी संकट के मुद्दों को कम करने की कुंजी है.”

आदिवासी जैव विविधता के अच्छे संरक्षणवादी

ट्राइबल मीट का उद्घाटन ISCA के जनरल प्रेसिडेंट डॉ. विजय लक्ष्मी सक्सेना ने किया. अपने संबोधन में डॉ. सक्सेना ने कहा कि ‘सेवा जोहार’ अर्थात प्रकृति मां की सेवा आदिवासियों के जीवन का सार है. उन्होंने भारतीय विज्ञान कांग्रेस के इतिहास में पहली बार आदिवासी सम्मेलन आयोजित करने के लिए आरटीएम नागपुर विश्वविद्यालय को बधाई दी. आदिवासी जैव विविधता के सबसे अच्छे संरक्षणवादी हैं. आदिवासियों से बेहतर कोई भी जंगल की देखभाल नहीं कर सकता है और स्थिरता प्राप्त करने के लिए उनके पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक ज्ञान के साथ मिश्रित किया जाना चाहिए.

जनजातीय सम्मेलन के पहले तकनीकी सत्र की अध्यक्षता नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. परदेशी लाल ने की. पर्यावरण संरक्षण के साथ आदिवासियों के आर्थिक विकास को संतुलित करने के लिए उन्होंने प्राकृतिक संसाधन आधारित अर्थव्यवस्था का समाधान निकाला. उन्होंने नागालैंड में जनजातीय उत्थान और महिला सशक्तिकरण में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका के बारे में विस्तार से बताया.

अपनी जड़ों का सम्मान करना चाहिए

आरटीएमएनयू के कुलपति डॉ. संजय दुधे ने कहा कि सतत विकास मानवता का भविष्य है. “जनजातीय जीवन शैली हमेशा टिकाऊ रही है और इसके अलावा, आदिवासी अब तक अपने सांस्कृतिक गुणों को संरक्षित करने में भी कामयाब रहे हैं. हम सभी को अपनी जड़ों का सम्मान करना चाहिए. वहीं डॉ. शामराव कोरेती नो कहा कि आदिवासी देनदारी नहीं बल्कि संपत्ति हैं.

नागपुर शहर के संस्थापक गोंड राजा बख्त बुलंद शाह के 14वें वंशज आदित्य शाह ने बैठक की सराहना की. डॉ. एस. रामकृष्ण, महासचिव-सदस्यता मामले, आईएससीए, डॉ. राजू हिवासे, रजिस्ट्रार, आरटीएमएनयू उपस्थित थे. प्रो. हिना नागभीरे और डॉ. संतोष गिरे ने बैठक का संचालन किया, जिसकी शुरुआत माया कोरेती द्वारा प्रस्तुत एक मधुर स्वागत गीत से हुई.

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