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शहादत दिवस:  जबरन वसूली, शोषण के खिलाफ लड़ने वाली लुसाई रानी रोपुईलियानी

Posted on January 3, 2023 - 5:41 pm by

अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ लड़ाई में जितना योगदान पुरुषों का है.  उतना ही योगदान महिलाओं का भी रहा है. भारत के स्वाधीनता महासंग्राम में महिलाओं की भी सामूहिक भागीदारी देखी गई है. महिलाओं ने अंग्रेजों के अन्याय के विरुद्ध निडरता, साहस और आत्मबल के साथ पूरी शक्ति से लड़ाइयां लड़ी. इन वीरांगनाओं की जितनी प्रशंसा की जाए कम है. इनका योगदान भारत की आज़ादी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है. ऐसा ही योगदान मिज़ोरम के आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाली  रानी रोपुईलियानी का भी रहा है. भले ही आपने रानी रोपुईलियानी के बारे में अधिक चर्चाएं नहीं सुनी होंगी. लेकिन अंग्रेजों के जबरन कर वसूली, शोषण, धर्म परिवर्तन और अन्य अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में एक अद्वीतीय महानायिका की भूमिका अदा की थी.

रानी रोपुईलियानी का परिचय

रानी रोपुईलियानी का जन्म 1806 में लुसाई हिल्स(Lushai Hills) यानी मिजोरम के आइजवाल(Aizwal) में हुआ था. उनका पूरा नाम लालनू रोपुईलियानी(Lalnu Ropuiliani) था. रानी रोपुईलियानी शासक परिवार से ताल्लुक रखती थी. उनके पिता लालसावुंगा वान्हुआइलियाना(Lalsavunga Vanhnuailiana) आइजवाल के ग्रेट चीफ़ रह चुके थे. वहीं रोपुईलियानी के पति वांडुला(Vandula) रालवांग(Ralvawng) इलाके के चीफ़ थे. वांडुला के पिता लुतपारहा(Tlutpawrha) थे और उनके दादा रोलुरा सैलो(Rolura Sailo) पूरे दक्षिण लुशाई हिल्स के शासक थे. बता दें कि लुशाई हिल्स के लोग गांवों के चीफ़्स को लाल(Lal) कहते थे.

रानी रोपुईलियानी के ऐतिहासिक जीवन काल की शुरुआत 1889 में हुई. जब डेनसुंग(Densung) में उनके पति वांडुला की मुत्यू हो गई. चूंकि वांडुला एक लाल यानी सरदार थे, रोपुईलियानी को लाल की गद्दी विरासत में दी गई. दरअसल लुशाई हिल्स के कई इलाकों में यह चलन था कि किसी चीफ़ के मृत्यू के बाद उनका राजगद्दी उनकी विधवाओं को सौंपी जाती थी. जिसके तहत रोपुईलियानी भी चीफ़ बनी थी. यहीं से रानी रोपुईलियानी का अदम्य साहसी प्रारूप को देखा गया था. अपने शासक परिवार से मिली विशेष्ताओं को अपने अंदर समेटे रोपुईलियानी ने अपने हिस्से के इलाकों निडरता और आत्मविश्वास के साथ चलाने लगी थी.

धर्म परिवर्तन और खेती पर पाबंदी नराज थे लुसाई चीफ

1890 में जब अंग्रेजों ने आखिरकार अपना कोलोनियल साम्राज्य को लुशाई हिल्स में शामिल कर लिया. तब सभी चीफ़्स से उनके क्षेत्रों के लोगों पर कर वसूली और मजदूरों की मांग पर जोर देने लगे थे. साथ ही इलाके में धर्म परिवर्तन बहुत तेजी से कराया जाने लगा था. इसके अलावा उनके खेती करने पर भी अनेकों पाबंदियां लगाई जा रही थी. अंग्रेजों द्वारा जबरन इन कार्यों को अंजाम दिए जाने से सभी चीफ़्स को आपत्ति होने लगी. और वे इसका विरोध करने लगे. इस पर अंग्रेजों ने चीफ़्स के साथ शांति को लेकर कई सभाएं भी की, लेकिन रोपुईलियानी ने इन सभाओं में अपनी हाजरी देने से साफ नकार दिया.

रोपुईलियानी को यह कतई बरदास्त नहीं था कि अंग्रेज़ उनके लोगों पर दबाव डालकर उनके धर्म परिवर्तन करे, कर वसूली करे, मजदूर बना कर ले जाए या उनके ही जमीनों पर अपना राज चलाए. रानी रोपुई लियानी का सीधा कहना था कि उनके इलाके के लोग अंग्रेजों द्वारा चलाए जा रहे इन तुच्च नियमों का पालन किसी भी हाल में नहीं करेंगे. वो उनका इलाका है और उनपर अंग्रेज अपना हक नहीं जमा सकते.

अंग्रेजों के खिलाफ विरोध जताने के लिए करती थी प्रेरित

रोपुईलियानी के विरोधों से अंग्रेज उन्हें सभी फसादों का जड़ मानने लगे थे. वो ना सिर्फ अपने इलाके में आने वाले क्षेत्रों को, बल्कि अन्य चीफ़्स को भी अंग्रेजों के खिलाफ विरोध जताने के लिए भी प्रेरित करती थी. उन्होंने अपने छोटे बेटे लालथुआमा(Lalthuama) और अन्य लोगों के साथ कई बार अंग्रेजों के टुकड़ियों पर हमला भी किया था. इन सब से परेशान अगस्त 1893 में कैप्टन सेक्सपीयर के नेतृत्व में अंग्रेजों ने मां और बेटे को हथियार, पशु, अनाज आदि देने का दबाव बनाया. पर उन्होंने ये सब देने से साफ मना कर दिया और इसके बावजूद अन्य क्षेत्रों के चीफ़्स(मुख्य नेतृत्वकर्ताओं) के साथ मिलकर युद्ध छेड़ने की नीति बनाने लगे.

कैप्टन सेक्सपीयर को कहीं से इसके भनक लग गई और उन्होंने बगैर किसी चेतावनी के रोपुईलियानी के इलाकों में देर रात हमला बोल दिया. दुर्भाग्यवस उस हमले में सभी चीफ़ लोग पकड़े गए और उनके सारे हथियारों को जब्त कर लिया गया. 26 अक्टूबर 1893 रोपुईलियानी और उनके दिशानिर्देश पर कार्य कर रहे बेटे लालथुआमा को लुंगलेई(Lunglei) में गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद दोनों मां बेटे को 8 अप्रील 1894 को लुंगलेई से रंगमती(Rangamati) के जेल में ले जाया गया, जो वर्तमान के बांग्लादेश में मौजूद है.

दो साल जेल में रही, वहीं पर अंतिम सांस ली

रानी रोपुईलियानी अंग्रेजों के सामने अंत तक झुकने से इनकार कर दिया था. उनके रैंक के अनुकूल अंग्रेजों ने मां और बेटे को प्यून की नौकरी देनी चाही, लेकिन उन्होंने उसे भी ठुकरा दिया. अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार होने का सदमा रानी रोपुईलियानी को कतई बरदास्त नहीं था. गिरफ्तारी के दो सालों के अंतराल में ही 3 जनवरी 1895 को जेल में वह अपनी आखिरी सांस ली थी. 86 साल की उम्र में अंग्रेजों द्वारा डायरिया की सही से इलाज नहीं कराने से रानी रोपुईलियानी की मृत्यू हो गई थी.

मृत्यू के बाद बेटे लालथुआमा को अपनी मां के शव को उनके गांव रालवांग ले जाने दिया गया. रानी रोपुईलियानी के बाकी सभी बेटे अलग-अलग युद्ध में मारे जा चुके थे. छोटे बेटे लालथुआमा को जेल से रिहा कर दिया गया, ताकि वह अपनी मां के अंतिम क्रिया विधियों को उनके गांव रालवांग में कर सके.

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