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NCST ने वन संरक्षण नियम 2022 पर मंत्रालय से स्थगित करने को कहा

Posted on October 20, 2022 - 5:18 pm by

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने पर्यावरण और वन मंत्रालय से आग्रह किया है कि जून में अधिसूचित नए नियमों को स्थगित की जाए. NCST ने परियोजना मंजूरी को प्राथमिकता पर गंभीर चिंता की है. नए वन संरक्षण नियम 2022, वन अधिकार अधिनियम, 2006 में निहित आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं. एनसीएसटी अध्यक्ष हर्ष चौहान ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र भेजा है.

टाईम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि वन संरक्षण नियम 2022 ने वन संरक्षण नियम 2014/2017 में प्रदान किए गए ‘सहमति खंड’ को हटा दिया है. उक्त खंड वन अधिकार अधिनियम के तहत इस आवश्यकता को लागू करता है कि अधिकारियों को वनवासियों के वन अधिकारों को मान्यता देनी चाहिए और ‘पहले चरण की मंजूरी’ के लिए वन भूमि के डायवर्जन का प्रस्ताव भेजने से पहले ग्राम सभाओं का अनुमोदन भी प्राप्त करना चाहिए

लिखे गए पत्र में कहा गया है कि  मौजूदा नियमों ने सहमति लेने की आवश्यकता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है. साथ ही पहले चरण की मंजूरी या यहां तक कि दूसरे चरण की मंजूरी के बाद किए जाने वाले अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया को छोड़ दिया है.

वन संरक्षण नियम 2022 ‘भूमि बैंकों की स्थापना और पेड़ लगाने का काम की प्रक्रियाओं’ में वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करते हैं.

बता दें कि वन संरक्षण नियम 2022 की अधिसूचना जारी होने के बाद बड़ा विवाद छिड़ गया था. आरोप लगा गया था कि नए नियम वन अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए वनवासियों के अधिकारों से समझौता किया.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी. इसके बाद आयोग ने प्रथमदृष्टया आरोपों से सहमत होते हुए इस मुद्दे को समग्र रूप से देखने के लिए एक कार्य समूह का गठन किया था.

पर्यावरण मंत्री यादव भेजे गए पत्र में आयोग के प्रमुख ने वन और आदिवासी मामलों के मंत्रालयों की इस दलील को खारिज कर दिया है कि नए नियम वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन नहीं करते हैं, क्योंकि ये ‘समानांतर वैधानिक प्रक्रियाएं’ हैं. अध्ययन का हवाला देते हुए वन भूमि के डायवर्जन की एक गंभीर तस्वीर पेश करते हुए आयोग के प्रमुख चौहान ने तर्क दिया, ‘यही कारण है कि वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन और वन संरक्षण अधिनियम के तहत प्रक्रियाओं को अलग-अलग समानांतर प्रक्रियाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता है. इसके बजाय दोनों कानूनों को एक-दूसरे के संयोजन के साथ लागू करने की आवश्यकता है.’

चौहान ने यह भी तर्क दिया है कि वन मंत्रालय का 3 अगस्त 2009 का सर्कुलर, सुप्रीम कोर्ट का 2013 का नियमगिरि फैसला और 2014 और 2017 का एफसी संशोधन नियम इस सिद्धांत को बरकरार रखता है कि एफसीए के तहत वनों के डायवर्जन में एफआरए के आलोक में एसटी और ओटीएफडी के वन अधिकार में संशोधन किया जाता है.

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