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ओडिशा: मिलेट के पुन: वापसी में कुटिया कोंध जनजाति का योगदान

Posted on November 25, 2022 - 4:04 pm by

नेहा बेदिया

ओडिशा में साल 2011 के एक अनुसंधान में मिलेट के पांच प्रकार की तुलना में 12 प्रकार की खेती करते देखी गई थी. हांलाकि मिलेट उस समय धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर था. मिलेट के इन प्रकारों के अस्तित्व को बचाने और इसकी खेती में वृद्धी लाने की एक मुहीम चलाई गई. इसका परिणाम यह रहा कि ओडिशा के आदिवासी आज मिलेट को मुख्यधारा पर खड़ा कर रहे हैं.

मिलेट्स को समझा जाता था गरीबों का अनाज

दरअसल ओडिशा में आदिवासियों के लिए बाजरा मुख्य भोजन हुआ करता था. लेकिन जब धान और अन्य खाद्य पदार्थ उनके घरों तक पहुंचने लगे  तो आदिवासियों ने मिलेट को गुजर-बसर फसल के रूप में आचरण करने लगे. सार्वजनिक वितरण योजनाओं और बढ़ते उपभोक्ता बाजार में मिलेट नहीं के बराबर रहता था. जिससे इसके उपजाऊ में कमी आने लगी थी.

आदिवासी इसे बेचने के बजाय केवल उपयोग करने या खुद खाने के लिए उगाते थे. जो संभवत: इस फसल के कुछ प्रकार के गायब होने की वजह बनने लगे. मिलेट के गायब होने की एक वजह यह भी रही कि लोग इसे गरीबों का अनाज समझते थे. विशेष रूप से युवा पीढ़ी मिलेट को निचले अनाज के नजर से देखती थी.

कुटिया कोंध आदिवासी

मिलेट्स के कई किस्म हम खो चुके हैं

निर्मन के कार्यकारी निदेशक  प्रशांत मोहंती ने कहा कि 2011 में अनुसंधान उद्देश्यों के लिए बाजरा पर एक अध्ययन करते समय, हम डुपी गांव में एक अनिश्चित स्थिति में आए. खेतों से मिलेट के गायब होने के विषय में बात उठाई गई. आदिवासियों को इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि कैसे वे अपनी पसंदीदा फसल की कुछ किस्मों को पहले ही खो चुके हैं.

बता दें कि निर्मन एक गैर-सरकारी संस्थान है. इस संस्थान के तहत किए गए इस अनुसंधान के द्वारा मिलेट को पुन: वापसी करने की शुरुआत की गई. मोहंती आगे बताते हैं कि पहला प्रयोग हमने उन्हें अपने गाँव और परिधि में उगाए गए मिलेट की संख्या को याद करने के लिए कहकर किया था. ग्रामीणों को मिलेट की विभिन्न प्रकारों के बारे में जानकारी मिली.  जो उन्होंने अपने जीवनकाल में देखी और बोई थी. आदिवासियों द्वारा अपनी लड़ाई लड़ने से पहले इस तरह एक बुनियादी डेटा बेस तैयार किया गया था.

जागरूकता की शुरूआत आदिवासी त्यौहारों से हुई

निर्मन ने मिलेट नेटवर्क ऑफ इंडिया (मिनी) के सहयोग से एक मंच की स्थापना की, जो मिलेट के प्रचार-प्रसार का जरिया बन सके. इसके लिए उन्होंने ओडिशा के कुटिया कोंध जनजाति द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार बर्लंग यात्रा को साधा. इस त्योहार को मिलेट की विशेषताओं के बारे में जागरुक करने के लिए बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा. इससे मिलेट के प्रति बसे हीन भावना को युवाओं के अंदर से निकाला गया.

बर्लंग यात्रा मिलेट के नए सिरे से दोबारा खेती में विस्तार से जगह बनाने में सक्रिय साबित हुआ. बता दें कि बर्लंग उत्सव मुख्य रूप से ओडिशा के कंधमाल जिले में निवास कर रहे कुटिया कोंध जनजाति द्वारा मनाया जाता है. यह एक पारंपरिक वार्षिक उत्सव है, जहां ग्राम स्तर पर गीतों और नृत्यों के माध्यम से किया जाता है. इस उत्सव को समुदाय को लोग खास कर महिलाएं पूजा और बीजों का आदान प्रदान करतीं हैं.

मिलेट्स का महत्व को आदिवासियों ने समझा

इस त्योहार में मिलेट के बीजों के आदान-प्रदान पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा. साथ ही आदिवासी बड़ी संख्या में इसमें रुचि दिखाने लगे. हांलाकि आदिवासी इसे कई फसलों के साथ हमेशा से उगाया करते थे. लेकिन निर्मन के प्रयास के बाद से इसमें बढ़त देखी गई.

ओडिशा सरकार ने साल 2017 में आदिवासी समाज में अत्यधिक पौष्टिक और जलवायु अनुकूल मिलेट के महत्व को समझा. जिसके बाद सरकार ने 2017 में मिलेट मिशन शुरू किया. साल 2022 में 2,800 करोड़ रुपये से अधिक के अतिरिक्त निवेश के साथ कार्यक्रम का विस्तार किया गया. इस साल, 19 जिलों में लगभग दो लाख किसान बाजरा की खेती में शामिल हैं. लगभग 3.23 लाख क्विंटल बाजरे की खरीद हो चुकी है. अपनी ओर से ओडिशा सरकार ने भी फसल को लोकप्रिय बनाने के लिए 10 नवंबर को मंडिया दिवस (मिलेट डे) मनाना शुरू कर दिया है.

आज के इस समय में ओडिशा में पौष्टिक मिलेट का पुन: वापसी व्यापक रूप से ध्यानाकर्षित कर रहा है. केंद्र और अन्य राज्य सरकारें इसके प्रचार मॉडल को अपनाने के लिए तैयार हैं. कंधमाल जिले के छोटे इलाकों के कुटिया कोंध आदिवासी का यह योगदान बेहद सराहनीय है. फसल का जीवित रहना और बाद में मुख्यधारा में लाना अपने-आप में किसी मकसद को पूरा करने जैसा है.

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