Skip to main content

हर दो सप्ताह में एक आदिवासी भाषा की मौत हो जाती है : UNO

Posted on December 17, 2022 - 12:21 pm by

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2022 से 2032 तक आदिवासी भाषाओं को अन्तर्राष्ट्रीय दशक मनाने की घोषणा की थी. जिसमें संयुक्त राष्ट्र लम्बे समय से आदिवासी समुदायों के अधिकारों,  उनके पारम्परिक ज्ञान व भाषाओं के संरक्षण के लिये प्रयास कर रही है. जिन्हें विशेष संस्कृतियाँ व प्रथाएँ विरासत में मिली हैं. जिनका पर्यावरण से गहरा नाता है.

यूएन महासभा के 77वें सत्र के लिये अध्यक्ष कसाबा कोरोसी ने कहा, “आदिवासियों की भाषाओं को सहेज कर रखना ना केवल इन समुदायों के लिये अहम है,  बल्कि सारी मानवता के लिये भी आवश्यक है. लुप्त हो जाने वाली हर एक आदिवासी भाषा के साथ ही, उससे जुड़ा विचार, संस्कृति, परम्परा और ज्ञान भी खो जाता है.”

उन्होने आगे कहा,“यह इसलिये मायने रखता है चूँकि हमें पर्यावरण के साथ अपने सम्बन्ध में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है.”

80 सालों में आधी आदिवासी भाषाएं खत्म हो जाएंगी

आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के यूएन कार्यालय के अनुसार आदिवासी समुदाय की  विश्व में आबादी  छह फ़ीसदी से भी कम है. उनमें विश्व की छह हज़ार 700 से अधिक भाषाओं में से चार हज़ार बोली जाती हैं. लेकिन  विशेषज्ञों का मानना है कि इस सदी के अन्त तक, इनमें से लगभग आधी भाषाओं के लुप्त हो जाने की आशंका है.

हर दो सप्ताह में एक आदिवासी भाषा खत्म हो जाती है

महासभा प्रमुख हाल ही में माँट्रियाल में यूएन जैवविविधता सम्मेलन से लौटे हैं. उन्होंने भरोसा जताया कि यदि प्रकृति के संरक्षण प्रयासों को सफल बनाना है, तो हमें आदिवासी आबादी को सुनना होगा, और हमें ऐसा उन्हीं की भाषाओं में करना होगा.

कसाबा कोरोसी ने खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के आँकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया कि आदिवासी लोग  विश्व में शेष जैवविविधता के लगभग 80 फ़ीसदी के रखवाले हैं. इसके बावजूद  हर दो सप्ताह में एक आदिवासी भाषा ख़त्म हो जाती है.

महासभा प्रमुख ने सभी देशों से आदिवासी समुदायों के साथ मिलकर कार्य करने का आग्रह किया ताकि उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके, जिनमें अपनी भाषाओं में शिक्षा व संसाधनों की सुलभता का अधिकार भी है. साथ ही  यह सुनिश्चित किया जाना होगा कि इन समुदायों और उनके ज्ञान का शोषण ना किया जाए.

उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदिवासी समुदायों के साथ अर्थपूर्ण विचार-विमर्श को बढ़ावा दिया जाना होगा और उन्हें निर्णय-निर्धारण प्रक्रिया के हर चरण में सम्मिल्लित करना होगा.

No Comments yet!

Your Email address will not be published.