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परमवीर अलबर्ट एक्का: एक मात्र आदिवासी जिन्हें मिला परमवीर चक्र, जानिए बलिदान की कहानी

Posted on December 3, 2022 - 5:04 pm by

विजय उरांव

झारखंड की राजधानी रांची के हृदय स्थल पर आज लांस नायक अलबर्ट एक्का की आदम कद प्रतिमा सैनिक लिबास में मशीनगन ताने लगी हुई है. यह भारत बांग्लादेश की जीत की कहानी बताती है. जब दुनिया के मानचित्र पर एक नया देश उदय हो रहा था, तब तक गुमला का यह सूरज अपनी छाप छोड़कर अस्त हो गया था. इस वीर को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

लांस नायक अलबर्ट एक्का झारखंड के गुमला जिले के जारी गांव के रहनेवाले थे. अलबर्ट एक्का जब सेना में भर्ती हुए तब वह चीन से लड़े. उस समय बिहार रेजिमेंट में थे. 1962 की लड़ाई के नौ साल बाद पाकिस्तान के जबड़े से कराहते बांग्लादेश को आजाद कराने चल पड़े तब वे 14 गार्ड के लांस नायक बन चुके थे. बहुत कम सैनिकों को यह नसीब हुआ कि चीन के साथ भी युद्ध किया और पाकिस्तान को भी धूल चटाई. अलबर्ट एक्का पहले आदिवासी हैं जिन्हे परमवीर चक्र दिया गया है.

युद्ध को भारत के पक्ष में किया था

तीन दिसंबर 1971 की वह काली रात थी जब चारों ओर गोलियां चल रही थीं. कहीं से आग के गोले निकल रहे थे तो कहीं से हैंड ग्रेनेड व मोर्टार छोड़े जा रहे थे. अलबर्ट का मोर्चा गंगा सागर के पास था. यहीं पास में रेलवे स्टेशन था, जहां 165 पाकिस्तानी घुसपैठी अड्डा जमाए थे. तीन दिसंबर की रात 2.30 बजे अलबर्ट और उनके साथी रेलवे पार गए. उस समय अलबर्ट 29 वर्ष के थे. जैसे ही रेलवे स्टेशन पार किए. पाकिस्तानी सेना के संतरी ने थम कहा. उस संतरी को गोली मारकर दुश्मन के इलाके में घुस गए. एलएमजी बंकर से आक्रमण हुआ. तभी अलबर्ट एक्का ने बहादुरी का परिचय देते हुए अपनी जान की परवाह किए बिना अपना ग्रेनेड एलएमजी में डाल दिया. इससे पाक सेना का पूरा बंकर उड़ गया. 65 पाक सैनिकों को मार गिराया और 15 को कैद कर लिया.

अलबर्ट को 21 गोलियां लगी थी

रेलवे के आउटर सिग्नल इलाका को कब्जे में लेने के बाद वापस आने के दौरान टाप टावर मकान के ऊपर में खड़ी पाक सेना ने अचानक मशीनगन से हम पर हमला कर दिया. इसमें 15 भारतीय सैनिक मारे गये. तब अलबर्ट दौड़ते हुए टाप टावर पर चढ़ गए. टाप टावर के मशीनगन को अपने कब्जे में लेकर दुश्मनों को तहस-नहस कर दिया. इस दौरान अलबर्ट एक्का को 20 से अधिक गोलियां लगीं. शरीर छलनी हो गया था. वे टाप टावर से नीचे गिर गये. जहां अंतिम सांस ली. जारी के वीर सपूत अलबर्ट बलिदान हो चुके थे। अलबर्ट एक्का नहीं रहते तो 150 जवान मारे जाते.

भारत-पाक का युद्ध 16 दिसंबर तक चला था

गंगा सागर की जीत के बाद दक्षिणी और दक्षिणी पश्चिमी छोर से अखौरा तक पहुंचना भारतीय सेना के लिए आसन हो गया. इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय सेना के हमले के आगे दुश्मन को अखौरा भी छोड़कर भागना पड़ा. तीन दिसंबर से 16 दिसंबर 1971 तक यह युद्ध चला और बांग्लादेश का उदय हुआ.

इस नए देश के निर्माण में झारखंड के इस सपूत के साथ रांची और आस-पास के करीब 26 जवानों ने अपनी जान की आहुति दी थी. रांची में इन सभी 26 शहीद परिवारों को पांच-पांच हजार की मुआवजा राशि दी ही गई. जमीन, नौकरी आदि का आश्वासन भी सरकार की ओर से दिया गया. 21 जनवरी 1971 को रांची के बारी पार्क में एक समारोह का आयोजन किया गया. इसमें 7 लाख, पांच हजार राशि प्रदान की गई. तत्कालीन बिहार के राज्यपाल देवकांत बरुआ ने ये राशि प्रदान की.

गांव में भव्य समाधि बनाने का सपना अधूरा रह गया

परमवीर चक्र विजेता अल्बर्ट एक्का के परिवार को राज्यपाल ने अपनी ओर से 25 हजार रुपये देने की घोषणा की. उनके गांव में पांच एकड़ भूमि भी दी गई, जिसका पर्चा 21 जनवरी को ही राज्यपाल ने अल्बर्ट एक्का के पिता को दिया. अलबर्ट की पत्नी विधवा बलमदीना एक्का अपने तीन साल के पुत्र विनसेंट के साथ इस कार्यक्रम में उपस्थित थीं. जो जमीन मिला, वह विवादित रहा. बलमदीना का सपना था कि उनके गांव में पति की भव्य समाधि बने. पर यह आज भी अधूरा ही है. अब बलमदीना भी नहीं रहीं. जिस घर में वे जन्म लिए थे, वह खंडहर हो गया. सीसीएल ने एक घर उनके गांव में बनाकर दिया, लेकिन आधा अधूरा.

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