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पारसनाथ विवाद: मारंग बुरु को संतालियों को सौपने की मांग, हेमंत का पुतला दहन

Posted on January 18, 2023 - 11:33 am by

आदिवासी सेंगेल अभियान की ओर से असर मरांडी के नेतृत्व में 17 जनवरी को झारखंड के दुमका में हेमंत सोरेन का पुतला दहन किया गया. इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम दुमका उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा गया. यह प्रदर्शन मारंग बुरू(पारसनाथ) को भारत के संताल आदिवासियों को वापस करने को लेकर की गई. आदिवासी सेगेंल अभियान के द्वारा मारंग बुरू को लौटाने की मांग को लेकर सालखान मुर्मू ने देशभर में 17 जनवरी से यात्रा शुरू कर दी है.

मारंग बुरू संताल आदिवासियों के देवता

ज्ञापन में कहा गया कि मारंग बुरु अर्थात झारखंड के गिरिडीह जिला के पीरटांड़ प्रखंड में अवस्थित पारसनाथ पहाड़ संताल आदिवासियों का ईश्वर है. संताल आदिवासी अपनी सभी पूजा-अर्चनाओं में सबसे पहले ” हिरला मारंग बुरू हिरला ” का उच्चारण करते हैं. पारसनाथ पहाड़ में आदिवासियों का जाहेरथान (पूजा स्थल) भी है. जहां युग-युग से आदिवासी पूजा अर्चना और धार्मिक- सांस्कृतिक सेंदरा या शिकार  भी करते आ रहे हैं. यह मारंग बुरू मुसलमानों के मक्का मदीना, हिंदुओं के अयोध्या राम मंदिर, ईसाइयों के रोम वैटिकन सिटी गिरजाघर और सिखों के स्वर्ण मंदिर से कम महत्वपूर्ण नहीं है.

अतः सरकारों द्वारा आदिवासियों की धार्मिक मान्यता और भावनाओं पर हमला करते हुए आदिवासियों को पूर्णता दरकिनार कर मारंग बुरू को आदिवासियों से छीनकर जैनियों को सुपुर्द करना मतलब आदिवासियों के भगवान का कत्ल करने जैसा है. आदिवासियों का धार्मिक अन्याय, अत्याचार और शोषण करना है.

प्रिवी काउंसिल ने संतालों के पक्ष में सुनाया था फैसला

आदिवासी सेंगेल अभियान भारत और विश्व के आदिवासी समुदायों की तरफ से इसका विरोध करते हुए इसके पुनर्वापसी की मांग की है. उनका कहना है कि मारंग बुरु पर आदिवासियों का प्रथम अधिकार है. इसकी पुष्टि इंग्लैंड में अवस्थित प्रिवी काउंसिल ने भी 1911 में जैन बनाम संताल आदिवासी के विवाद पर संताल आदिवासियों के पक्ष में फैसला देकर किया था.

आदिवासियों की मांग है मारंग बुरु अर्थात हमारे ईश्वर को हमें अविलंब वापस कर दिया जाए. पारसनाथ पहाड़ हमारे लिए ईश्वर है. मारंग बुरु पर हमला आदिवासियों के अस्तित्व, पहचान, हिस्सेदारी पर हमला है. अतः इसे जैन धर्मावलंबियों को सुपुर्द करना हमारे ईश्वर को सुपुर्द करना है. हमारे ईश्वर की हत्या करना है.

संतालों के अन्य बुरू

ज्ञापन में आगे कहा कि मारंग बुरू हमारे लिए सर्वोच्च पूजा स्थल और तीर्थ स्थल है. उसी प्रकार लुगू बुरु जो झारखंड के बोकारो जिले में अवस्थित है. अयोध्या बुरु, जो पुरुलिया जिला (पश्चिम बंगाल) में है, भी हमारे महान तीर्थ स्थल हैं. इसी प्रकार अनेक पहाड़- पर्वत हमारे पूजा स्थल हैं, तीर्थ स्थल हैं. जिन पर लगातार हमला जारी है. उनकी रक्षा सुनिश्चित करना सभी संबंधित सरकारों की जिम्मेवारी है. परन्तु सरकारों की आदिवासी विरोधी मानसिकता बाधक साबित हो रहे  हैं.

पहाड़ हमारे देवता

देश की सभी पहाड़- पर्वत आदिवासियों को सौंपा जाए, पहाड़ पर्वतों में आदिवासियों के देवी – देवता वास करते हैं और आदिवासी भी वास करते हैं. आदिवासी प्रकृति और पर्यावरण को अपना पालनहार और ईश्वर मानते हैं. इसलिए आदिवासियों के देवी देवता और प्रकृति पर्यावरण की रक्षा, जो आदिवासी कर सकते हैं, द्वारा विश्व मानव समुदाय की भी रक्षा संभव है. अन्य लोगों के लिए पहाड़ -पर्वत टिंबर और खनिज पदार्थों का भंडार है और व्यवसायिक कारणों से दोहन और मुनाफे का केंद्र मात्र है.

यूनाइटेड नेशन जनरल असेंबली के अध्यक्ष कसाबा कोरोशी का हवाला देते हुए कहा कि उन्होने 16.12.2022 को कहा कि यदि प्रकृति के संरक्षण प्रयासों को सफल बनाना है तो हमें आदिवासी आबादी को उनकी भाषा में सुनना होगा. अर्थात आदिवासियों के हासा, भाषा, जाति, धर्म, रोजगार आदि और संवैधानिक अधिकारों को बचाना अब प्रकृति- पर्यावरण और मानवता को बचाने जैसा है.

झारखंड में जेएमएम की सोरेन सरकार ने जहां मारंग बुरु (पारसनाथ पहाड़) को जैनियों को सौंपकर इसका जैनीकरण करने की कोशिश किया है तो लुगू बुरु को पर्यटन स्थल घोषित कर इसके हिंदूकरण का प्रयास किया है. जेएमएम पार्टी ने अब तक केवल वोट और नोट की राजनीतिक लाभ के लिए संताल परगना (झारखंड) का ईसाईकरण और इस्लामीकरण कर असली सरना आदिवासियों के साथ लगातार अन्याय,अत्याचार, शोषण कर रहा है. संताल परगना हमारे लिए 22 दिसंबर 1855 को अंग्रेजों द्वारा संघर्ष के उपरांत स्थापित महान भूभाग- मातृभूमि है. जिसकी रक्षा अविलंब अनिवार्य है.

सरना कोड की मांग

आदिवासी हिंदू, मुसलमान, ईसाई आदि नहीं, मूर्तिपूजक नहीं हैं, व्यक्ति केंद्रित ईश्वर को नहीं मानते हैं. ऊंच-नीच की वर्ण व्यवस्था उनके बीच नहीं है. स्वर्ग और नरक की परिकल्पना तथा पुनर्जन्म  आदि को नहीं मानते हैं. अतः प्रकृति पूजक आदिवासियों के लिए हिंदू,मुसलमान, ईसाई आदि धार्मिक मान्यताओं की तरह आदिवासियों को भी संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 25 ) के तहत अलग धार्मिक मान्यता देते हुए सम्मान के साथ जनगणना आदि में शामिल किया जाए। 2011 की जनगणना में सर्वाधिक (लगभग 50 लाख) आदिवासियों ने अपनी प्रकृति पूजा धर्म को ” सरना धर्म ” के नाम से अंकित किया था. अतः आदिवासी सेंगेल अभियान की मांग है हर हाल में 2023 में सरना धर्म (प्रकृति धर्म) कोड को मान्यता देकर प्रकृति पूजक आदिवासी और प्रकृति पर्यावरण को सम्मान दिया जाए। और विश्व मानवता की रक्षा की जाए.

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