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पारसनाथ विवाद: आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार आदिवासी संगठन, 10 जनवरी को करेंगे आंदोलन

Posted on January 8, 2023 - 4:29 pm by

झारखंड के गिरिडीह में स्थित पारसनाथ पहाड़ी को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. जैन समुदाय के तीर्थस्थल पर केंद्र सरकार के फैसले का विरोध बढ़ता जा रहा है. आदिवासी संगठनों ने झारखंड के गिरिडीह जिले में जैन समुदाय के “चंगुल” से पारसनाथ पहाड़ियों को “मुक्त” करने की अपनी मांग तेज कर दी है.

राँची के पुराने विधानसभा सभागार में पत्रकारों से बात करते हुए, धरोहर को बचाने के आह्वान के साथ आगामी 10 जनवरी को पारसनाथ(मरांग बुरु) में देश भर के आदिवासियों से जुटने की अपील की गई है. खास बात यह कि इन संगठनों की अगुवाई झामुमो के वरिष्ठ विधायक लोबिन हेंब्रम कर रहे हैं. पहाड़ी के आस-पास के लगभग 50 गांवों के लोगों ने कहा है कि इसकी तराई में वे पीढ़ियों से रहते आए हैं और इसपर किसी खास समुदाय का अधिकार नहीं हो सकता.


बता दें कि सम्मेद शिखर पारसनाथ पहाड़ी को पर्यटन स्थल के रूप में नोटिफाई किए जाने के विरोध में देश-विदेश में जैन धर्मावलंबी लगातार प्रदर्शन कर रहे थे. इसके बाद बीते 5 जनवरी को केंद्र सरकार ने इस नोटिफिकेशन में संशोधन करते हुए यहां पर्यटन की सभी गतिविधियां स्थगित करने का आदेश जारी किया था. केंद्र सरकार ने यहां मांस-शराब की बिक्री पर रोक लगाने और इस स्थान की पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के निर्देश भी राज्य सरकार को दिए हैं.

आदिवासी परंपरा को रोकने पर होगा विरोध
प्राचीन समय से आदिवासी रहते आए हैं. यह पहाड़ हमारा मरांग बुरू है. मरांग का अर्थ होता है देवता और बुरू का अर्थ है पहाड़. सदियों से हम यहां अपने प्राचीन तौर-तरीकों से पूजा करते आए हैं. अगर केंद्र या राज्य सरकार के किसी भी आदेश के जरिए यहां के मूल निवासियों और आदिवासियों को इस स्थान पर जाने या फिर अन्य तरह की परंपराओं के निर्वाह से रोका जाएगा तो इसका पुरजोर विरोध होगा.

10 जनवरी को जुटेंगे देशभर के आदिवासी

इस धरोहर को बचाने के लिए आगामी 10 जनवरी को यहां पूरे देश से आदिवासी जुटेंगे. दावा किया गया है कि इस दिन हजारों लोग पहुंचेंगे. इस मांग को लेकर 25 जनवरी को बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू गांव में भूख हड़ताल भी की जाएगी.
हाल के महीनों में स्थानीय भाषाओं और मूलवासियों के अधिकारों को लेकर सैकड़ों जनसभाएं करने वाले युवा नेता जयराम महतो ने भी कहा है कि इस पहाड़ की तराई में रहने वाले हर व्यक्ति का इसपर अधिकार है. अगर स्थानीय लोगों को किसी भी तरह इस पहाड़ पर जाने से रोकने की कोशिश हुई तो जोरदार आंदोलन होगा.

गजट में है दर्ज

झामुमो विधायक लोबिन हेंब्रम सहित आदिवासी संगठनों के नेता नरेश मुर्मू, पीसी मुर्मू, अजय उरांव, सुशांतो मुखर्जी ने कहा कि जैन मुनि यहां तपस्या करने आए और यहां उनका निधन हो गया तो इसका अर्थ कतई नहीं कि यह पूरा पहाड़ जैन धर्मावलंबियों का हो गया.

बिहार, हजारीबाग गजट 1957 में यह उल्लेखित है कि मारंग बुरु/पारसनाथ संताल समुदाय का पवित्र स्थान है. इसमें यह भी कहा गया है कि बैशाख की पूर्णिमा के समय वहां संताल समुदाय का तीन दिवसीय सम्मेलन होता है, जिसमें पूरे देश से आदिवासी जुटते हैं. 1911 में हमें रेकार्ड ऑफ राइट मिला है. जैन समुदाय इसके खिलाफ कोर्ट गया था. निचली अदालत से ऊपरी अदालत तक उनके दावे को खारिज कर दिया गया.

यह गजट में प्रकाशित है. प्रिवि काउंसिल ने भी हमारे पक्ष में निर्णय दिया, हमारे कस्टम को मान्यता दी. हमें शिड्यूल एरिया के तहत और संविधान के आर्टिकल 244 के तहत अपने कस्टम के अनुपालन का अधिकार दिया गया है. आर्टिकल 13 हमें अपनी रूढ़ी- प्रथा के अनुपालन की आजादी देता है. आदिवासी कस्टम में हम हड़िया भी पूजते हैं और बलि भी चढ़ाते हैं.
झारखंड सरकार ने भी 2003 में हमारी व्यवस्था को मान्यता दी है. बलि को भी मान्यता दी गयी है. वर्तमान फैसले से पूरे बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल व असम के साथ साथ नेपाल, बांगलादेश व अन्य जगहों पर रह रहे आदिवासी भी उद्वेलित हैं. केंद्र व राज्य सरकार फैसले पर पुनर्विचार करे. यह उल्लेख करे कि यह आदिवासियों का धार्मिक स्थल है.

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