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राजस्थान: क्यों ट्रेड कर रहा है #पाखंडी_भगाओ_बेणका_बचाओं

Posted on February 2, 2023 - 12:28 pm by

आदिवासियों के कुंभ के नाम से प्रसिद्ध श्रीबेणेश्वर धाम मेले का बुधवार को शुभारंभ हुआ, यह मेला राजस्थान के डुंगरपुर जिले के सोम, माही और जाखम नदीं के संगम पर लगता है. इस मेले में एक विवाद उत्पन्न हो गया है. मेले में आदिवासी अपने पुरखों की अस्थियों का विसर्जन करते हैं. जिसमें आदिवासियों से कर्मकांड के नाम पर ब्राह्मणों के द्वारा पैसे वसुलने के आरोप लग रहे हैं.

बता दें कि एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें ट्राइबल एम्पलाइज फेडरेशन के दिनेश खानन यह कहते हुए दिख रहे हैं कि पंडे आदिवासी समाज को लुटने का काम कर रहे हैं. जबकि आदिवासी समाज में धर्म और दर्शन में कहीं भी पूजा प्रावधान नहीं है और कहीं भी अस्थि विसर्जन कर सकते हैं.

विप्र सेना ने दिनेश खानन को गुंडा कहकर, अंधविश्वास और कर्म कांड के नाम पर लुटने से रोकने के चलते जान से मारने की धमकी दी है. इसके अलावा दिनेश खानन की शिक्षक की नौकरी छीनने की बात कह रहे हैं.

दिनेश खानन का कहना है कि बेणका आदिवासियों का बड़ा आस्था का स्थल है. यहां पर पूरे संभाग से अस्थि विसर्जन के लिए आते हैं. आदिवासियों के पूजा-विधान और दर्शन के अनुसार कर्म कांड किया जाता है. लेकिन दो चार सालों से यहां पर पूजारियों ने बैठना शुरू कर दिया है, जो लोगों को भावनाओं में भर कर के आदिवासियों से पैसे की वसूली की जाती है. मेरे पास कुछ पीड़ित लोग वेदना लेकर आये थे. तो मैं वहां पर गया तो देखा कि जबरन बुलाकर के पैसे ऐंठे जा रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा कि मैं एक समाज का होने के नाते नैतिक कर्तव्य बनता है कि इन कृत्यों को रोके और मैंने उन लोगों से जबरन लुटने से रोकने के लिए आग्रह किया. आदिवासी इतने समझदार नहीं है कि सभी बातों को समझ पाएं, कृप्या करके उन्हें न लुटे. वे सक्षम नहीं हैं कि पैसे दे सके.

दिनेश खानन ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी भी वर्ग विशेष को कुछ गलत कहना नहीं है. मेरे खिलाफ जो षड़यंत्र रचा जा रहा है.

आदिवासी स्थाल का ब्राह्मणीकरण किया जा रहा है

वहीं भीलप्रदेश विद्यार्थी मोर्चा के जिला संयोजक देवीलाल खड़ा के अनुसार महानदी घाटी में अनादिकाल से रहनेवाले भीलवंश के माघ पूर्णिमा पर मन्नारे-मन्नारी(पुरखे) फूल(बाल, नाखून, अस्थि) विसर्जन करते हैं. उनका आरोप है कि मन्नारे-मन्नारी फूल स्थली बेणका टापू का ब्राह्मणीकरण किया जा रहा है. जबकि गैर आदिवासी पितृ तर्पण स्थल गंगा नदी घाट देश भर में रहा है. वहीं भीलवंशी सहित आदिवासी समुदाय अपने आस-पास नदी बेल स्थानक(नदी संगम) पर अनादिकाल से वर्ष भर मरे पुरखों का फूल विसर्जन करते आये हैं.

देवीलाल खड़ा बताते हैं कि मावजी महाराज के जमाने से आदिवासी और गैर आदिवासियों के बीच बेणका टापू को लेकर संघर्ष रहा है. यह अंग्रेजों के समय में भी रहा है.

ट्राइबल एम्प्लाइज फेडरेशन के प्रदेशाध्यक्ष दिनेश खानन का ताजा विरोध इसी विचार के तहत है. कुछ पीड़ित लोगों के कहना पर कि जबरन धर्म कर्म के नाम पर पंडो के द्वारा वसूली की जा रही है. बेणका को पाखंड मुक्त करने की घोषणा की जा रही है.

वहीं आदिवासी नेता छोटूवसावा का कहना है कि क्या भीलप्रदेश की माही नदी भी 1000 साल पहले इस इलाके में आए पाखंडियों की विरासत होने दे. फिर अनादिकाल से रहनेवाले भील आदिवासियों के पास क्या रहेगा?

वसावा ने आगे कहा है कि ना सिर्फ बेणका पुरे देश के आदिवासियों के धार्मिक स्थल गैर आदिवासी पाखंड से मुक्त होने चाहिए.

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