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गुजरात चुनावः कौन हैं अफ्रीकी मूल के सिद्दी आदिवासी, जिनके लिए पहली बार अलग मतदान केंद्र बनाया गया

Posted on December 1, 2022 - 1:26 pm by

गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के पहले चरण का मतदान 1 दिसंबर को हो रहा है. लेकिन इसमें खास बात है कि यहां अफ्रीकी मूल के आदिवासी भी मतदान करने जा रहे हैं. खास बात इसमें ये है कि पहली बार इनके लिए अलग से मतदान केंद्र बनाया गया है. यह केंद्र मिनी अफ्रीकी गांव कहने जाने वाले जूनागढ़ जिले के जंबूर गांव में बनाया गया है. सिद्दी आदिवासी इस मौके पर वहां अपने पारंपरिक नृत्य के माध्यम से इस खास मौके सेलिब्रेट कर रहे हैं.

कौन हैं सिद्दी आदिवासी
यूनाइटेड नेशन के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित एक वीडियो रिपोर्ट के मुताबिक 19वीं शताब्दी में जूनागढ़ के नवाब ने इन्हें अफ्रीका से भारत लाया. जिस वक्त रेल की पटरियां भारत में बनाई जा रही थी, इसे उठाने के लिए इन आदिवासियों को खासतौर पर लाया गया था. इसके अलावा नवाब इन्हें अपने बॉडीगार्ड बनाने के लिए भी इस आदिम जनजाति के लोगों को प्रमुखता से अपने दल में बहाल किया था.

गुजरात में रह रहे सिद्दी आदिवासी वहां जंगल सफारी में भी बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं. खासतौर पर शेर के बॉडी लैंग्वेज को वो बेहतर तौर पर समझ सकते हैं. जिस वजह से लोग टूर गाईड के तौर पर इन्हें प्रमुखता दी जाती है. ये आदिवासी मानते हैं कि इनके लिए सरकारी सहायता तो दी जाती है, लेकिन उन तक पहुंचती नहीं है. हमारे बच्चे हिन्दी और गुजराती तो जानते हैं, लेकिन आज के समय में आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना बेहद जरूरी है. इनका साफ मानना है कि अपना देश हिन्दुस्तान है, यहीं जीना और मरना है.

सिद्दी ट्राइब गुजरात के जूनागढ़, जामनगर, पोरबंदर, राजकोट, भावनगर के अलावा अहमदाबाद, बरूच और कच्छ में रहते हैं.

मतदान बूथ बनने के बाद क्या कहा
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक गुजरात का जम्बूर गांव जिसे भारत का मिनी अफ्रीका कहा जाता है, जम्बूर में पहली बार ये जनजाति समुदाय खुद के बूथ पर मतदान करने जा रहा है. इस समुदाय के लिए पहली बार चुनाव आयोग ने विशेष जनजातीय बूथ बनाया है. इस अवसर पर उन्होंने पारंपरिक नृत्य कर, अच्छे पकवान बनाकर अपनी खुशियां जाहिर कीं. इससे पहले यह समुदाय बगल के गांव में जाकर अपना मतदान करता था.

सिद्दी समुदाय के एक आदिवासी अब्दुल मगुज बताते हैं, हमें भारत का अफ्रीका कहा जाता है. हम सिद्धि आदिवासी समुदाय के रूप में जाने जाते हैं. सरकार आदिवासियों को मदद देती रहती है, इसमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन हमारे स्थानीय समुदाय को यहां तकलीफ होती है, हमें उतनी सुविधा नहीं मिलती है आदिवासी अपने रास्ते पर चलते हैं.

वो आगे कहते हैं, यह बहुत खुशी की बात है कि चुनाव आयोग ने हमें वोट देने के लिए एक विशेष बूथ बनाने का फैसला किया है. हम बरसों से इस गांव में रह रहे हैं. लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है जिससे हमें बहुत खुशी हो रही है. उन्होंने कहा कि हमें अब आजादी मिली है. हालांकि अभी और भी मिलनी बाकी है.

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