Skip to main content

संघर्ष की कहानी: कभी दो वक्त की रोटी नशीब नहीं थी, आज हैं अमेरिका में साइंटिस्ट

Posted on November 14, 2022 - 2:54 pm by

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के एक आदिवासी अमेरिका में वरिष्ठ साइंटिस्ट के तौर पर कार्यरत हैं. एक दौर ऐसा था,  जब उन्हें दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं होती थी. लेकिन उन्होंने उस वक्त की चुनौतियों का सामना करते हुए अपने मेहनत के दम पर आज इस मुकाम को हासिल किया है. उनका यह सफर वाकई काफी सराहनीय है, जिसे देख लोगों को प्ररणा लेनी चाहिए.

दरअसल जिस आदिवासी  साइंटिस्ट के सफर के बारे में बात हो रही है.  उसका नाम भास्कर हलामी है. हलामी (44 वर्षीय) कुरखेड़ा तहसील के चिरचडी गांव में आदिवासी समुदाय के बीच पले बढ़े हैं. उनकी शुरुआती जीवन कठिन परिस्थितियों में परिश्रम करते हुए बीता है. यही वजह है कि वे अमेरिका के मेरिलैंड में बायोफार्मास्यूटिकल कंपनी सिरनामिक्स इंक के रिसर्च एंड डेवेलोपमेंट ब्लॉक में एक सीनियर साइंटिस्ट हैं. यह कंपनी आनुवंशिक दावाओं में रिसर्च करती है. जिसमें हलामी आरएनए निर्माण और संश्लेषण का काम देखते हैं.

संघर्षपूर्ण रहा है जीवन, पिता करते थे घरेलु सहायक के रूप में काम

एक एजेंसी से बात करने के दौरान हलामी ने बताया कि उनका परिवार शुरुआती दिनों में कैसे थोड़े साधनों से गुजारा करता था. उन्होंने कहा कि हमें एक वक्त के भोजन के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था. मेरे माता-पिता हाल तक सोचते थे कि जब भोजन और काम नहीं था, तो परिवार ने उस समय में कैसे गुजारा किया.

उन्होंने कहा कि वर्ष में कुछ महीने विशेष रूप से मानसून, अविश्वसनीय रूप से कठिन रहता था क्योंकि परिवार के पास जो छोटा खेत था उसमें कोई फसल नहीं होती थी और कोई काम नहीं होता था.

हलामी ने कहा कि हम महुआ के फूल को पकाकर खाते थे, जो खाने और पचाने में आसान नहीं होते थे. हम परसोद (जंगली चावल) इकट्ठा करते थे और पेट भरने के लिए इस चावल के आटे को पानी में पकाते थे. यह सिर्फ हमारी बात नहीं थी, बल्कि गांव के 90 प्रतिशत लोगों के लिए जीने का यही जरिया होता था. बता दें कि चिरचडी 400 से 500 परिवारों का गांव है. हलामी के माता-पिता गांव में घरेलू सहायक के रूप काम करते थे.

पिता को नौकरी मिलने पर घर की हालत बेहतर हुई

हलामी के परिवार की स्थिति तब थोड़ी बेहतर हुई. जब उनके पिता को 100 कीमी दूर कसनसुर तहसील के एक स्कूल में नौकरी मिली. पिता के काम पर जाने के बाद परिवार के पास संपर्क करने को कोई साधन नहीं था. काम पर सही सलामत पहुंचे की नहीं इसका पता पिताजी के तीन-चार महीने बाद वापस आने पर चला. इसके बाद पूरा परिवार कसनसुर तहसील में स्थानांतरन कर लिया.

अपने गांव से पहले व्यक्ति हैं जिंहोने डिग्री प्राप्त की है

कसनसुर तहसील में हलामी ने कक्षा 1 से 4 तक की स्कूली शिक्षा आश्रम स्कूल से की. उन्होंने छात्रवृत्ति परिक्षा पास करने के बाद कक्षा 10 तक की पढ़ाई सरकारी विद्यानिकेतन केलापुर में की. इसके बाद उसने गढ़चिरौली के एक कॉलेज से विज्ञान स्नातक की डिग्री ली. उसने फिर नागपुर में विज्ञान संस्थान से रसायन विज्ञान में स्नात्कोत्तर की डिग्री प्राप्त की. वे अपने गांव चिरचडी में ये डिग्रियां हासिल करने वाले पहले व्यक्ति है.  हलामी ने बताया कि उनके पिता शिक्षा के मुल्य को समझते थे और उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सभी भाई-बहन अपनी पढ़ाई पूरी करें.

सफलता का सारा श्रेय माता पिता को

साल 2003 में हलामी को नागपुर के प्रतिष्ठित लक्ष्मीनारायण इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया. इस दौरान उन्होंने महाराष्ट्र लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास कर ली. इसके बावजूद उनका अनुसंधान पर ध्यान बना रहा. जिसके बाद वे अमेरिका में मिशिगन टेक्नोलॉजी युनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई की. उन्होंने डीएनए और आरएनए में बड़ी संभावना को देख इसे अपने अनुसंधान का विषय चुना.

भास्कर हलामी अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता को देते हैं. वो आज जो कुछ भी हैं, अपने माता-पिता के प्रयास और संघर्ष के बदौलत हैं. उनका यह सफर लोगों को प्रोत्साहित करने के साथ अत्यंत प्रेरणादायक है.

No Comments yet!

Your Email address will not be published.