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शानदार : जानिए फोर्ब्स इंडिया मैगजीन में किस आदिवासी महिला को मिली जगह

Posted on December 8, 2022 - 6:13 pm by

झारखंड की युवा कवि और स्वतंत्र पत्रकार जसिंता केरकेट्टा ने फोर्ब्स इंडिया की सेल्फ मेड वुमन की सूची में अपनी जगह बनाई है. साल 2022 की लिस्ट में जसिंता केरकेट्टा को जगह मिली है. भारत में अलग- अलग क्षेत्र की कुल 22 महिलाओं को इसमें शामिल किया गया है. फोर्ब्स इंडिया ने दिसंबर के अंक में पूरे भारत से महिलाओं को शामिल किया है. फोर्ब्स इंडिया की सूची में शामिल जंसिता केरकेट्टा आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली हिंदी की पहली युवा कवि एवं लेखिका हैं.

जसिंता केरकेट्टा ने ट्वीट किया है, “फॉर्ब्स में पहली बार मेरे साथ – साथ झारखंड का सौ से भी अधिक पुराना फुटकल गाछ प्रकाशित है. गांव के लोग उसकी उम्र को लेकर कहते हैं कि वह हमारे पुरखों के समय से ऐसे खड़ा है. जल-जंगल-जमीन-जुब़ान और ज़मीर की बात कहता है जिन्हें हम पीढ़ी दर पीढ़ी दोहराते हैं.”

बता दें कि 7 दिसंबर को फॉर्ब्स इंडिया के ऑफिशियल ट्वीटर हैंडल के द्वारा ट्वीट कर जानकारी साझा की है. जिसमें जसिंता की 2021-22 में उपलब्धियों में भूमि पर संघर्ष, जंगलों के अंदर रहने वालों पर जोखिम प्रबंधन कार्यक्रमों के प्रभाव, और झारखंड और ओडिशा में स्वदेशी आबादी के बीच जमीनी लोकतंत्र से संबंधित मुद्दों को शामिल किया है.

फॉर्बस ने संभावनाओं संबंध में कहा है, “अपने लेखन के माध्यम से आदिवासी युवाओं के लिए अपना काम जारी रखना चाहती हैं. उनका उद्देश्य शहरी आदिवासियों के बीच की खाई को पाटना है जो अपनी जड़ों से कटे हुए हैं और गाँव के युवा जो शहर के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, ताकि वे एक-दूसरे का समर्थन कर सकें.”

कौन है जसिंता केरकेट्टा

जंसिता केरकेट्टा आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली हिंदी की पहली युवा कवि एवं लेखिका हैं. वह लगातार आदिवासी मुद्दो पर आवाज उठाती रही है. उनका जन्म झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के खुदपोस गाँव में एक ग़रीब आदिवासी परिवार में हुआ. कॉलेज की पढ़ाई के लिए उनकी माँ ने ज़मीन गिरवी रख उन्हें पैसे दिए. पढ़ाई के ख़र्च के लिए कई छोटे-मोटे कार्य करती रहीं. संघर्ष के इन्हीं दिनों में उन्होंने कविताएँ लिखनी शुरू की जहाँ उनका व्यक्तिगत दुःख समष्टिगत दुःख में अभिव्यक्त होता हुआ अपने समाज के विमर्श को आगे लेकर बढ़ा.  उनकी पहली किताब 2016 में आदिवाणी प्रकाशन, कोलकाता से हिंदी-अँग्रेज़ी में छपी थी. इसके बाद इस किताब को जर्मन के प्रकाशन द्रौपदी वेरलाग ने ग्लूट नाम के नाम से इसे हिंदी-जर्मन में प्रकाशित किया. इस किताब की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए प्रकाशक ने इसे दोबारा छापा.

उनकी कविताओं का अनुवाद कई देशी-विदेशी भाषाओं में हुआ है. इसके साथ ही उन्हें काफ़ोस्करी यूनिवर्सिटी, मिलान यूनिवर्सिटी, तुरिनो यूनिवर्सिटी, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी जैसे कई मंचों से कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया. उन्हें कई देशों के आमंत्रण प्राप्त हुए हैं जहाँ उन्होंने अपनी कविताओं पर संवाद किया है. उन्हें इटली के तुरीनो शहर में आयोजित 31 वें इंटरनेशनल बुक फ़ेयर में भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था. इस अवसर पर उनके कविता-संग्रह ‘अंगोर’ के इतालवी अनुवाद ‘ब्राचे’ का लोकार्पण भी हुआ जिसे इटली के मिराजी प्रकाशन ने छापा है.

उनकी कविताओं में परवाह, मातृभाषा की मौत, सभ्यताओं की मरने की बारी, नदी,पहाड़ और बाजार, मेरे हाथों का हथियार, सारंडा के फूल आदि शामिल है.  

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