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सर्वे : क्यों हो रही है आदिवासी जिलों में मौत

Posted on November 24, 2022 - 1:11 pm by

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा भारत के 12 आदिवासी जिलों में एक सर्वेक्षण किया गया. इस सर्वेक्षण से पता चला है कि असंक्रमक रोग (एनसीडी) इन क्षेत्रों में काफी सक्रिय है. साथ ही इन क्षेत्रों में 66% मौतों का कारण बन रहे हैं.

वहीं गैर-आदिवासी जिलों में एनसीडी के कारण करीब 63% मौतों का कारण है. इससे यह साफ जाहिर होता है कि आदिवासी और गैर-आदिवासी जिलों में मौतों की प्रतिशत लगभग बराबर है. बता दें कि इन असंक्रमक रोग में मुख्य रूप से हृदय रोग, कैंसर, पुरानी सांस की बीमारियाँ और मधुमेह शामिल है.

सत्तर फीसदी आदिवासियों की मौत घर में हुई

एनसीडी के बाद  आईसीएमआर सर्वेक्षण के अनुसार संक्रामक रोग (15%) और चोटों (11%) के कारण अधिकतम मौतें हुईं.  यह सर्वेक्षण 5,000 से अधिक मृत आदिवासियों के परिवार के सदस्यों के साक्षात्कार पर आधारित था और 2015 से 2018 के बीच आयोजित किया गया था.

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अधिकांश यानी 70% आदिवासियों की मृत्यु घर पर हुई थी. अधिकारियों ने कहा कि यह स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जागरूकता की कमी के साथ-साथ देश के आदिवासी जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी को दर्शाता है.

आईसीएमआर सर्वेक्षण की यह रिपोर्ट इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित हुआ है. सर्वेक्षण के अनुसार, उन्होंने मृतक के 5,292 परिवारों से बात की. जिसमें 70% ने कहा कि उनके रिश्तेदार घर पर मर गए, 9% जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मर गए, 5% लोगों की मृत्यु निजी अस्पताल में हुई, 3% लोगों की मृत्यु पीएचसी/सीएचसी/ग्रामीण अस्पताल और 2% मेडिकल कॉलेज/कैंसर अस्पताल में हुई. इस दौरान लगभग 10% आदिवासी ऐसे थे जिन्हें याद नहीं था कि मृत्यु कहाँ हुई थी. इनमें कुछ अन्य (3%) ने कहा कि उनके रिश्तेदार की मृत्यु स्वास्थ्य सुविधा के रास्ते में हुई थी.

एक चौथाई आदिवासियों को कोई ईलाज नहीं मिली

सर्वेक्षण से पता चला है कि तकरीबन एक-चौथाई मृतक अपनी पहले से मौजूद बीमारी के लिए किसी भी इलाज पर नहीं थे.  बाकी का इलाज या तो जिला अस्पताल (25%), निजी अस्पताल (20%), पीएचसी/सीएचसी/ग्रामीण अस्पताल (19%), मेडिकल कॉलेज/कैंसर अस्पताल (9%) या स्थानीय डॉक्टरों/जनजातीय चिकित्सकों (13%) में किया जा रहा था. 

आईसीएमआर सर्वेक्षण से यह भी पता चला है कि मृत आदिवासियों में से 29% का उच्च रक्तचाप का इतिहास था. यह हृदय रोगों के लिए एक प्रमुख जोखिम कारक है. जीर्ण श्वसन रोग/अस्थमा 17%, स्ट्रोक (12%), हृदय रोग (11%), कैंसर (10%) और मधुमेह (9%) में मौजूद था.

आदिवासी क्षेत्रों में डॉक्टरों और अस्पतालों की घोर कमी है

आईसीएमआर अध्ययन का हिस्सा रहे डॉ प्रशांत माथुर ने टीओआई को बताया कि यह एक मिथक है कि आदिवासी लोग गैर-आदिवासियों के रूप में एनसीडी से प्रभावित नहीं होते हैं, जिन्हें अक्सर जीवन शैली की बीमारियों के रूप में संदर्भित किया जाता है. यह अध्ययन यह स्थापित करता है. परिणामों से यह भी स्पष्ट है कि बहुत से लोग घर पर ही मर जाते हैं, जो कि कम स्वास्थ्य चाहने वाले व्यवहार या क्षेत्र में डॉक्टरों या अस्पतालों की बहुत कमी के कारण हो सकता है. हमें उस पर काम करने की जरूरत है.

उन्होंने इस तथ्य की ओर भी इशारा किया कि बढ़ते शहरीकरण के साथ, यहां तक कि आदिवासी जिलों में भी जीवन शैली और भोजन की आदतों में बदलाव देखा गया है.

आईसीएमआर के नेशनल सेंटर फॉर डिसीज इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च के निदेशक डॉ माथुर ने कहा कि परिष्कृत खाद्य पदार्थ आदिवासी जिलों में उपलब्ध और उपभोग किए जाते हैं. इसके अलावा, तंबाकू उत्पादों के सभी रूपों की खपत काफी अधिक है, जो कि कुछ आदिवासी जिलों में कैंसर की उच्च घटनाओं से जुड़ा हुआ है.

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