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टाना भगतों ने चुनी हिंसा की राह, कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान

Posted on October 12, 2022 - 10:07 am by

नेहा बेदिया

टाना भगतों ने सोमवार 10 अक्टूबर को लातेहार सिविल कोर्ट के समक्ष 5वीं अनुसूची के तहत आदिवासी अधिकारों को लेकर अपना आक्रोश दिखाया. इसके साथ प्रदर्शनकारियों ने लगभग 5 घंटे तक कोर्ट को अपने कब्जे में रखा. उन्होंने विरोध करने के तरीके को पत्थरबाजी और हाथापाई पर ले आए. इसके बाद यह मामला मंगलवार 11 अक्टूबर को झारखंड हाइकोर्ट तक पहुंच गया. मामले को स्वत: संज्ञान में लेते हुए हाइकोर्ट ने अधिकारियों से इसका वितृत रिपोर्ट मांगा है.

पुलिस उपाधीक्षक संतोष मिश्रा के अनुसार टाना भगत समुदाय के प्रदर्शनकारियों ने मौके पर आए जिला प्रशासन व पुलिस अधिकारियों से शांतिपूर्वक बातचीत करने से साफ मना कर दिया. वे लगातार प्रधान न्यायाधीश को उनके हवाले करने की मांग पर अड़े थे. वे नारे लगा रहे थे कि अदालत को बंद कर देना चाहिए. वे 5वीं अनुसूची के मुताबिक कोर्ट चलाने को असंवैधानिक बता रहे थे. इस दौरान उनका आक्रोश पत्थरबाजी और हाथापाई पर आ गया. उन्होंने सड़क मार्ग को भी बाधित रखा। हालात बेकाबू होते देख पुलिस ने लाठीचार्ज की. इतना ही नहीं आंसू के गोले छोड़े गए और पानी की बौछार भी कराई गई। इस मुठभेड़ में सात पुलिसकर्मी घायल भी हुए.

उपाधीक्षक ने बताया कि इस आंदोलन के बारे में खूफिया जानकारी मिली थी, जिसके तहत अदालत के मुख्य द्वार को बंद कर दिया गया और पुलिस बल की तैनाती कराई गई. हालांकि इसके बावजूद भी आक्रोशित प्रदर्शनकारी अदालत परिसर में जबरन घुस गए और तोड़फोड़ किए। पुलिसकर्मियों के कठिन प्रयासों से अंतत: उन्हें शाम तक खदेड़ कर भगाया गया और अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई है.

वहीं इस मामले की हाइकोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस डॉ. रवि रंजन और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ के समक्ष मुख्य सचिव और डीजीपी भी उपस्थित रहे. चीफ जस्टिस ने इस मामले की जानकारी नहीं होने की लापरवाही पर मौखिक टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि लातेहार कोर्ट की घटना से साबित होता है कि राज्य की इंटेलीजेंस फेल रही.

इस बाबत खंडपीठ ने मुख्य सचिव और डीजीपी से इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिसकी अगली सुनवाई 20 अक्टूबर को होगी.

कौन है टाना भगत?

टाना भगत मूल रूप से एक आंदोलन का नाम है, जो बाद में आदिवासी समुदाय के रूप में भी तब्दील हो गया। टाना का शाब्दिक अर्थ ‘ टानना या खींचना ‘ है। चूँकि ये भगत अपनी गिरी हुई स्थिति को टानकर या खींचकर दूर फेंकना चाहते थे तथा उन्नत अवस्था को प्राप्त करना चाहते थे इसलिए इन्हें ‘टाना भगत’ कहा गया और इनके आंदोलन को ‘टाना भगत आंदोलन’ कह कर नवाजा गया। इस तरह टाना भगत आंदोलन एक प्रकार का संस्कृतीकरण आंदोलन था। इस आंदोलन का नेतृत्व टाना भगतों ने किया। उराँव लोग इन आंदोलनों को कुडुख धर्म या उराँवों का वास्तविक एवं मूल धर्म मानते थे। टाना भगत आंदोलन की शुरुआत धार्मिक व आर्थिक आंदोलन के रूप में हुई, बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़कर यह राजनीतिक आंदोलन बन गया।

कुछ इस प्रकार हुई शुरुआत –
टाना भगत आंदोलन की शुरुआत जतरा भगत द्वारा हुई। जब जतरा भगत मती का प्रशिक्षण ले रहे थे, तो 1914 ई. में उन्हें अचानक आत्म – ज्ञान हुआ। वे उस वक्त से जतरा उरांव से जतरा भगत कहलाने लगे। इस तरह टाना भगत आंदोलन का शुरुआत हुआ। जतरा भगत ने अंग्रेजी राज के अत्याचार, जमींदारों द्वारा बेगारी, समाज में फैले अंधविश्वास एवं कुरीतियों से पीड़ित आदिवासी समुदाय को सन्मार्ग दिखाने का संकल्प लिया। उसने घोषणा की कि ‘धर्मेश ‘ (ईश्वर) ने उसे जनजातियों का नेतृत्व सौंपा है। उसने धार्मिक भावनाओं को जाग्रत करके उराँवों को संगठित करना शुरू किया।
जतरा भगत द्वारा आरंभ किया गया यह आंदोलन संपूर्ण उरांव प्रदेश में जंगल की आग की तरह फैलने लगा। वर्ष 1916 ई. की शुरुआत में अपने अनुयायियों का मजदूरी करने से रोकने के अपराध में जतरा भगत और उनके सात अनुयायियों को गुमला के अनुमण्डल पदाधिकारी की कचहरी में पेस किया गया। बाद में उनकी आंदोलन के नये सिद्धांतों का प्रचार न करने और शांति बनाए रखने के शर्त पर उन्हें जेल से रिहा किया गया। जेल में किये गए कठोर प्रताड़ना से छूटने के दो मास के अंदर ही जतरा भगत की मृत्यु हो गई। लेकिन उनके द्वारा गठित टाना भगत आंदोलन के प्रचार-प्रसार में कोई कमी नहीं आई। इसका समर्थन लगातार बढ़ता रहा।

(प्रतिकात्मक फाइल फोटो)

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