Skip to main content

क्यों युनिस्को मान चुकी थी कि तराओ आदिवासी विलुप्त हो गए?

Posted on September 28, 2022 - 8:36 am by

इस समय जब दूनियां के कई हिस्से जनसंख्या विस्फोट जैसी समस्या का सामना कर रही है, वहीं भारत के मनिपुर की सबसे कम जनसंख्या वाली तराओ आदिवासी समुदाय विलुप्त होने की कगार पर है और स्वयं को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। तराओ आदिवासियों की जनसंख्या महज 1200 के करीब रह गई है। जनगणना 2011 के अनुसार तराओ आदिवासियों की जनसंख्या महज 1,066 है। द कमिटी ऑन प्रोमोशन ऑफ तराओ कम्युनिटी (COPTARC) के सर्वें अनुसार 2018 तक तराओ आदिवासियों की जनसंख्या महज 900 के आसपास है। जिसमें तराओ समुदाय के 192 घर है।

लुप्तप्राय आदिवासी समुदाय के रूप में चिंहित की गई है

कई जनजाति के लोग, जो अपनी बस्तियों के स्थानों में अन्य समुदायों के प्रभुत्व वाले है, अन्य बड़ी जनजातियों के साथ शामिल हो गए है, जिससे इस प्रक्रिया में उनकी पहचान खो गई है। तराओ के छोटी आबादी के कारण तराओ आदिवासियों को लुप्तप्राय समुदाय में रखा जा रहा है। हालांकि कहा जाता है कि तराओ आदिवासी समुदाय 1075 इस्वीं से मनिपुर में बसी हुई है। भारत सरकार 2003 में तराओ समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दी थी। कई लोगों के अनुसार तराओ तत्कालीन बर्मा से आए थे और मनिपुर के कुछ हिस्सों में बस गए थे, मुख्यत:  चंदेल क्षेत्र में । इसकी कुछ आबादी उखरूल में पायी जाती है।

तराओ जनजाति चंदेल जिले के चार गांवों में निवास करती है – लैमनई, लीशोकचिंग, खुरिंगमुउल और हाइकपोकपी और एक उखरूल जिले के सनाकेथेल गांव में।

युनेस्कों घोषणा कर चुकी थी कि तराओ विलुप्त हो गए

तराओ लिटरेचर सोसाइटी(TLS)  के अनुसार “संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (युनेस्को) ने 2009 में घोषना की थी कि तराओ आदिवासी विलुप्त हो चुकी है क्योंकि उनकी आधिकारिक भाषा अब बोली नही जाती है”

No Comments yet!

Your Email address will not be published.