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आदिवासी नृत्य महोत्सव 2022: दुनियाभर के आदिवासियों के नृत्य की कलाएं एक समान: भूपेश बघेल

Posted on November 2, 2022 - 2:02 pm by

रायपुर में राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव तथा राज्योत्सव का 1  नवंबर से शुरू हो गई है. साइंस कॉलेज मैदान में सीएम भूपेश बघेल ने दीप प्रज्वल्लित कर और नगाड़ा बजाकर इसकी शुरूआत की. इसके साथ ही विभिन्न राज्यों व देशों से आए आदिवासी कलाकारों ने अपने स्थानीय वाद्य यंत्रों का वादन कर शमा को बांधा. सीएम बघेल सहित अन्य लोग विभिन्न आदिवासियों की लोकवाद्य और लोकसंगीत पर थिरकते हुए नजर आए.

देश-विदेश के आदिवासी समुदाय हुए शामिल

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर तीसरे राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव और 23वां राज्योत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इससे पूर्व नृत्य महोत्सव साल 2019 और 2021 में मनाया गया था. महोत्सव में सभी राज्यों व केंद्र-शासित प्रदेशों तथा 10 देशों के आदिवासी कलाकार हिस्सा ले रहे हैं. जिसमें मोजांबिक, मंगोलिया, टोंगो, रशिया,  इंडोनेशिया, मालदीव, सर्बिया, न्यूजीलैंड, इजिप्ट और रवांडा सहित भारत के राज्यों व केंद्र-शासित प्रदेशों से करीब 1500 कलाकार शामिल हुए हैं.

आदिवसी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा, जीवन शैली, कला  आदि जैसे अहम बिंदुओं की सराहना की. संरक्षण के लिए आवश्यक बताया. इसमें आने वाले लोगों को छत्तीसगढ़ सहित देश-विदेश की विभिन्न जनजातियों की विविधता पूर्ण संस्कृति, परंपरा और लोककला देखने को मिल रही है.

दुनियाभर के आदिवासी समाज के नृत्य की कलाएं बहुत हद तक समान

कार्यक्रम में ऐसे ही देश-विदेश के कई आकर्षक नृत्य संगीत की प्रदर्शनी लगातार की जा रही है. जो लोगों को सिर्फ मनोरंजन का अहसास नहीं दिला रही है.  बल्कि विभिन्न जनजातियों के बारे में जानने और समझने को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है. मुख्यमंत्री बघेल ने इस अवसर पर कहा कि दुनियाभर के आदिवासी समाज के नृत्य की कलाएं बहुत हद तक समान हैं. आदिवासियों की छोटी सी इच्छा यही है कि प्रकृति पर पूरी मनुष्यता का समान अधिकार हो और मिलजुलकर संरक्षण करें. उन्होंने कहा कि इस डांस फेस्टिवल का उद्देश्य भी आदिम संस्कृति को बचाए रखना है.

सीएम ने आगे कहा कि इस नृत्य महोत्सव का उद्देश्य आदिम अधिकारों को बचाए रखने के लिए किया गया है. जब हम हम पूरी दूनियां की आदिम संस्कृति को बचाए रखेंगे तभी हमारी एकजुटता कायम रहेगी.

पहले दिन नृत्य से आदिवासी कलाकारों ने समा बांधा

पहले दिन  केरल राज्य के जनजातीय कलाकारों ने मंच पर पनिया निरूथम नृत्य किया. यह नृत्य पारंपरिक अनुष्ठानों के उपर आधारित होता है. केरल में पनिया का अर्थ पहला आदिवासी होता है. इसके बाद मिजोरम के कलाकारों ने चिराग नृत्य शैली को प्रदर्शित कर लोगों में उत्साह जगाया. इस नृत्य को बंबू डांस के रूप में भी जाना जाता है. चिराग नृत्य जनजातीय प्राचीन नाट्य शैली है. जो मुख्यत: फसल कटाई और वैवाहिक अनुष्ठान पर होता है. लक्षद्वीप के जनजातीय कलाकारों ने अपना प्रसिद्ध लावा नृत्य का प्रदर्शन किया. यह नृत्य धीमी गति से शुरू होकर विलंबित और फिर द्रुत नृत्य में बदल जाता है जिसे देखकर लोग रोमांचित हो गए. कर्नाटक के कलाकारों ने ढोलू कुनिथा नृत्य का प्रदर्शन किया. यह नृत्य कर्नाटक के चरवाहे पुरूषों के द्वारा किया जाता है. ढोलू कुनीथा शौर्य नृत्य का प्रतीक है. जिसमें प्रमुख वाद्ययंत्र के रूप में ढोल का प्रयोग होता है.

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