Skip to main content

जयंती विशेष: जानिए इस आदिवासी योद्धा को जिसे पकड़ने के लिए अंग्रेजों को रचना पड़ा षड्यंत्र

Posted on February 9, 2023 - 1:54 pm by

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देश के कई वीर सपूतों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी. इन्ही वीर स्वतंत्रता सेनानियों में एक नाम तेलंगा खड़िया का भी आता है. जिन्हें इतिहास के पन्नों में जगह भले ही नहीं मिल सकी, लेकिन देश की आजादी के लिए इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है.

तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 को वर्तमान झारखंड के गुमला जिले के सिसई प्रखंड के मुरगू गांव में हुआ था. इनके पिता का नाम ठुईया खड़िया तथा माता का नाम पेती खड़िया था. इनकी शादी रतनी खड़िया से हुई थी, जो अपने पति के हर कदम पर साथ देती थीं.

तेलंगा खड़िया की संघर्ष की बात करें तो वे 1831-32 के कोल क्रांति से काफी प्रभावित हुए थे. जिसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह को तेज कर दिया था. वे पेशे से एक आम किसान थे, लेकिन रोजाना खेती करने के साथ लोगों को पारंपरिक हथियारों जैसे तीर, भाला, फरसा आदि को चलाने का प्रशिक्षण भी देते थे.

तेलंगा ने 1850 के बाद ‘जोरी पंचायत’ नामक एक संगठन बनाया और लोगों को संगठित करना शुरू किया. वे अंग्रेजों के तमाम गतिविधियों को अपने विरोध के जरिए चलने नहीं देने लगे. अंग्रेजों को आदिवासियों से कर वसूलने, उनकी जंगल-जमीन हड़पने, गुलामी करवाने आदि कार्यों में बेहद परेशानी होनी लगी. इन सब से तंग आकर अंग्रेजों ने तेलंगा को पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन असफल हो रहे थे.

षड्यंत्र के तहत अंग्रेजों ने अपने दलालों के सहयोग से तेलंगा खड़िया को पकड़ने में कामयाब रहे. तेलंगा को 21 मार्च 1852 को गिरफ्तार कर कोलकाता के जेल में भेजा गया. इस बीच अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की गति भले ही कम हो गई थी, लेकिन थमी नहीं थी. करीब 14-15 साल बाद जब तेलंगा खड़िया जेल से रिहा हुए, तब उन्होंने विद्रोह की हवा को और तेज कर दिया. साल 1880 में उनके नेतृत्व में चलाए गए विद्रोह को खड़िया विद्रोह कहा जाने लगा.

अंग्रेजों को इस विद्रोह से बहुत घबाराहट होने लगी, जिसके बाद उन्होंने तेलंगा को मारने का फैसला किया. इसके तहत एक दिन जब तेलंगा दैनिक प्रार्थना कर रहे थे, तब छुप कर घात लगाए एक अंग्रेजी सिपाही ने उन पर गोली चला दी. गोली लगने से तेलंगा खड़िया की मौत हो गई. वे 23 अप्रैल 1880 को वीरगति प्राप्त हो गए.

हालांकि तेलंगा के अनुयायियों ने उस वक्त किसी तरह तेलंगा के शरीर को अंग्रेजों से बचाकर दूसरी जगह ले जाने में सक्षम रहे. जिसके बाद दक्षिण कोयल के तट पर स्थित सोसो निमटोली में उनका अंतिम संस्कार किया गया था.

वर्तमान में उस स्थान को ‘तेलंगा तोपा टांड’ के नाम से जाना जाता है.

No Comments yet!

Your Email address will not be published.