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नृत्य शैली का नाम वैसा न रखें जिससे आदिवासी समुदाय का अपमान होः मद्रास हाईकोर्ट

Posted on January 12, 2023 - 12:05 pm by

राज्य को यह सुनिश्चित करें कि किसी भी नृत्य प्रदर्शन को एक समुदाय के साथ नहीं जोड़ा जाए, जिससे समुदाय के सदस्यों को अपमानित किया जा सके. कुरावर समुदाय को अपमान करने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग वाली एक याचिका का निपटारा करते हुए मद्रास उच्च न्यायलय ने टिप्पणी की.

मदुरै खंडपीठ के न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति सत्य नारायण प्रसाद की पीठ ने भी राज्य और पुलिस अधिकारियों को कुरावर समुदाय को अश्लील तरीके से चित्रित करने वाले ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनुमति नहीं देने का निर्देश दिया.

समुदाय के अश्लील चित्रण पर शिकायत के लिए पोर्टल खोलने का निर्देश

कोर्ट ने अधिकारियों को आम जनता के लिए एक अलग पोर्टल खोलने का भी निर्देश दिया. जहां समुदाय के अश्लील प्रतिनिधित्व के संबंध में कोई शिकायत की जा सकती है. और इससे संबंधित वीडियो अपलोड हो सकती है. जिससे साइबर अपराध विभाग शिकायत पर गौर करके जब भी आवश्यक हो उचित कार्रवाई कर सकता है.

कोर्ट कुरावर समुदाय के उत्थान के लिए काम करने वाली संस्था वनवेनगैगल पेरावई के महासचिव ईरानी द्वारा दायर एक याचिका ‘मुथु मुरुगन बनाम भारत संघ और अन्य’ पर सुनवाई कर रही थी. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वर्तमान में पवित्र महाकाव्यों से नैतिक कहानियों को चित्रित करने के बजाय सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बदनाम किया गया है और अश्लीलता से भर दिया गया है.

नर्तक आदिवासी समुदाय के नहीं, उनके नामों का होता है उपयोग

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि पहले समुदाय के सदस्यों को इन कार्यक्रमों में प्रदर्शन करने के लिए कास्ट किया जाता था. लेकिन वर्तमान में नर्तक(Dancer) किसी आदिवासी समुदाय से संबंधित नहीं हैं, बल्कि सिर्फ उनका नाम का उपयोग किया जाता हैं.

समुदाय को निंदनीय तरीके से चित्रित करने से न केवल समुदाय के सदस्यों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है. बल्कि अन्य समुदायों के लोगों के मन में नफरत भी पैदा होता है. जिससे आदिवासी समुदाय के खिलाफ हिंसा भी देखने को मिलती है.

वहीं प्रतिवादी अधिकारियों ने तर्क दिया कि सरकार सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार कर रही है. और समुदायों के उत्थान के लिए कल्याणकारी योजनाएँ भी बनाई हैं. इसके साथ यह भी प्रस्तुत किया गया था कि पुलिस महानिदेशक ने पहले ही सभी पुलिस थानों को निर्देश दिया था. जिसमें आयोजकों से यह वचन लेने के बाद ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनुमति दें कि कोई अश्लीलता या अश्लीलता नहीं होगी. सार्वजनिक शांति और शांति में कोई व्यवधान नहीं होगा. यदि कोई उल्लंघन पाया जाता है, तो आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.

पारंपरिक कलाओं में महिलाओं को वस्तु बना दिया गया

आदिवासी कला रूपों की गलत व्याख्या पर अफसोस जताते हुए अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रथाओं को समाज में प्रचलित नहीं होना चाहिए. यह सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य था कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान व्यवहार किया जाए. कोर्ट ने कहा कि इन पारंपरिक कला रूपों में इस हद तक इतने बदलाव आए हैं कि इसने महिलाओं को सामान्य वस्तु बना दिया है.

इस न्यायालय के विभिन्न निर्देशों के बावजूद  नृत्य में अश्लीलता बनी रहती है.  कुरावर के आदिवासी कला रूप की इस तरह की गलत व्याख्या और गलत इस्तेमाल से समुदाय की भावना को ठेस पहुंचती है और उनके समुदाय की आड़ में वस्तुकरण(Objectification) के किया जाता है. इससे समुदाय से संबंधित व्यक्तियों का अनादर और बहिष्कार होता है, इसके बावजूद की वे लोग प्रदर्शन  में शामिल नहीं होते हैं. इन सभी के बाद भी  इस तरह के कला के रूप पर प्रतिबंध लगाने से व्यक्तिगत कलाकारों और समूहों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा. इसलिए कोर्ट ने प्रदर्शनों में ‘कुरावर-कुरथी’ नामों के उपयोग पर रोक लगायी है, जहां संबंधित समुदाय के लोग शामिल नहीं.

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